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02 February 2014

ज्वालामुखी से निकला लावा, 14 की मौत

indonesia volcano deadly eruption
इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप में सक्रिय एक ज्वालामुखी से निकल रहे गर्म पत्थर और राख की चपेट में आकर आसपास के गांवों में 14 लोग मारे गए हैं।

माउंट सिनाबुंग ज्वालामुखी शनिवार सुबह से ही धधक रहा है जिसकी राख और पत्थर इसके दायरे में आने वाले दो किलोमीटर के क्षेत्र में बरस रहे हैं।

आपात अधिकारी सुटोपो पुरवो नुगरोहो का कहना है कि मारे गए लोगों में चार स्कूली बच्चे और एक शिक्षक भी शामिल हैं।

माउंट सिनाबुंग ज्वालामुखी बीते तीन साल से सुप्त था। लेकिन बीते साल सितम्बर में इसके सक्रिय होने के बाद आसपास के गांवों से हज़ारों लोगों को सुरक्षित जगहों पर पहुंचाया गया था।

लेकिन इसी शुक्रवार कुछ लोगों को अपने घर लौटने की अनुमति मिल गई थी।

अधिकारियों को आशंका है कि ज्वालामुखी की वजह से हताहत हुए लोगों की संख्या बढ़ सकती है। लेकिन ज्वालामुखी की तपिश इतनी अधिक है कि वह इसके अधिक नज़दीक नहीं जा पा रहे हैं।

घटनास्थल की कुछ तस्वीरों से पता चला है कि राहतकर्मी लाशों को निकाल रहे हैं जो दरअसल राख के नीच दब चुकी हैं।

इससे पहले जब साल 2010 में यह ज्वालामुखी सक्रिय हुआ था, तब कम से कम दो लोग मारे गए थे और इसकी वजह से 30,000 लोगों को अपना घरबार छोड़कर कहीं ओर जाना पड़ा था।

साल 2010 से पहले माउंट सिनाबुंग में 400 वर्षों तक कोई हलचल नहीं हुई थी।

विशेषज्ञों का कहना है कि माउंट सिनाबुंग को कम सक्रिय ज्वालामुखी समझा जाता रहा है, इसकी वजह से अब इसकी सक्रियता के बारे में कोई अनुमान लगाना मुश्किल हो गया है।

क्या आप जानते हैं, कौन है इंटरनेट का मालिक?

internet governance

खास-खास

ट्यूनिस एजेंडा 'मील का पत्थर'
  • साल 2005 में आयोजित किए गए ट्यूनिस सम्मेलन में कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर चर्चा हुई।
  • ट्यूनिस एजेंडा–2005 में सरकार के अलावा अन्य सहभागियों पर चर्चा हुई और उनके सहयोग को आधिकारिक तौर पर पहचाना गया। कई अन्य अहम बिंदुओं पर भी चर्चा हुई और गठन हुआ आईजीएफ का यानी इंटरनेट गवर्नेंस फोरम का।
  • आईजीएफ़ का गठन तमाम सहभागियों की बात एक मंच पर लाने के उद्देश्य से किया गया था। इससे संबंधित देशों के नुमाइंदे हर साल सम्मेलन में इकट्ठा होते हैं और इंटरनेट गवर्नेंस के एक सर्वमान्य स्वरूप पर चर्चा करते हैं।
  • अब ये चिंता जताई जा रही है कि ट्यूनिस एजेंडा नौ साल पुराना हो चुका है और तब से अब तक इंटरनेट के परिदृश्य में कई बदलाव हुए है। इंटरनेट यूज़र्स का एक वर्ग नहीं चाहता कि नीतियां ‘पुराने एजेंडे’ पर आधारित कर बनाई जाएँ।

इंटरनेट के जन्म से आज तक, इसके स्वरूप में ज़मीन-आसमान का फ़र्क आ चुका है। गोपनीय सरकारी दस्तावेज़ों से लेकर आम लोगों के चैट रिकॉर्ड और ईमेल, सभी कुछ इंटरनेट की वर्चुअल ताकों पर रखा हुआ है।

सोचिए इसका मालिकाना हक अगर किसी व्यक्ति या देश के पास होता तो वह देश कितना माला-माल हो जाता। लेकिन सच यह है कि इंटरनेट का कोई एक मालिक नहीं है।

इंटरनेट की उत्पत्ति और उसमें रोज़ाना होने वाले इनोवेशनों के लिए सरकारों से लेकर निजी क्षेत्र, इंजीनियर्स, सिविल सोसाइटी के लोगों के अलावा और भी कई क्षेत्रों का सहयोग है।

पर स्थिति तब चिंताजनक हो जाती है जब इंटरनेट पर प्रत्यक्ष या परोक्ष नियंत्रण रखने की बात की जाए।

इंटरनेट पर अमरीका का 'दबदबा'
इंटरनेट गवर्नेंस पर पिछले दो दशकों से बहस हो रही है और इसे नियंत्रित किए जाने और ना किए जाने के पक्षों में लगातार चर्चाएं हो रहीं हैं।

इंटरनेट डोमेन यानी वेबसाइट पता जारी करने वाली संस्था, आईकैन (इंटरनेट कॉरपोरेशन फॉर असाइंड नेम्स एंड नंबर्स) जैसी इंटरनेट की मूलभूत कंपनियां अमरीका में स्थित हैं, जिस वजह से ये माना जाता है कि इंटरनेट पर अमरीका का दबदबा है।

लेकिन इंटरनेट पर एकाधिकार की स्थिति से बचने के लिए इसे संयुक्त राष्ट्र के अंतर्गत किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में लाए जाने की कोशिश की जा रही है।

कुछ देश चाहते हैं कि इंटरनेट गवर्नेंस की ऐसी व्यवस्था बने जिसमें इंटरनेट सरकारों के नियंत्रण में रहे।

ऐसी मांग के पीछे एक अहम कारण ये भी है कि देशों को साइबर सुरक्षा की चिंता भी है और सुरक्षा के क्षेत्र में इसके दुरुपयोग का डर भी। यही कारण है कि कई देश मन ही मन इसके नियंत्रण का हक पाना चाहते हैं।

संयुक्त राष्ट्र के कई सदस्य एक ऐसी बहुपक्षीय व्यवस्था चाहते हैं बने जिसमें इंटरनेट से जुड़े सभी पक्षों का हित संरक्षित हो।

भारत में भी इंटरनेट की आज़ादी पर चर्चा

भारत में भी इस बारे में व्यापक तौर पर चर्चा की जा रही है। बीते बुधवार दिल्ली में इंटरनेट और टेलिकॉम से जुड़ी संस्थाओं ने मिलकर एक गोलमेज़ बैठक का आयोजन किया जिसमें सरकारी, गैर-सरकारी वर्ग और सिविल सोसाइटी के लोगों ने हिस्सा लिया। इनमें अध्ययन, व्यापार, वकालत, तकनीक और सामाजिक कार्य से जुड़े लोग शामिल हुए।

इंटरनेट गवर्नेंस से जुड़े संयुक्त राष्ट्र के विशेष समूह मैग (मल्टी-स्टेकहोल्डर एडवायज़री ग्रुप) की सदस्या शुबि चतुर्वेदी कहती हैं, “इंटरनेट सरकार के प्रारूप से बाहर की उपलब्धि है। अभिव्यक्ति की आज़ादी, सार्वलौकिकता, इनोवेशन ये सभी इसके मूल सिद्धांत हैं। ऐसे में विचार इस बात पर करना है कि क्या यूएन के तहत ऐसा कोई मॉडल बन सकता है जिसमें समाज, सरकार और निजी क्षेत्र समेत सभी को बराबर का अधिकार मिले।”

उन्होंने कहा, “ट्यूनिस एजेंडा एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है जिसमें मल्टीस्टेकहोल्डर्स के बारे में विस्तार से चर्चा की गई थी लेकिन इसे लिखे गए नौ साल हो गए हैं और साल 2015 में इसे अपडेट किया जाना है।”

बीते साल जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र की कमीशन ऑन साइंस एंड टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट की बैठक में भारत ने अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा था कि इंटरनेट का अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन बहुपक्षीय, पारदर्शी और लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप होना चाहिए, जिसमें सरकार और दूसरे सहयोगियों की पूरी भागीदारी हो।

'अपनी जगह ब्राज़ील को दे रहा भारत'

हालांकि भारत ने इस बारे में अपने विचार दमदार तरीके से अंतरराष्ट्रीय समुदाय के आगे नहीं रखे। कई विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने जानबूझकर इस बारे में मज़बूती से कदम नहीं उठाए और इस मामले पर विकासशील देशों के समूह का नेतृत्व ब्राज़ील को करने दिया।

शुबि चतुर्वेदी कहतीं हैं, “दूसरे विकासशील देशों के मुकाबले भारत की नुमाइंदगी काफ़ी कम है और मुझे लगता है इसके पीछे वजह आम जनमानस में इस मुद्दे पर जानकारी का अभाव है। इसीलिए सरकारें ऐसे मुद्दे प्रभावशाली तरीके से नहीं उठातीं।”

आने वाले समय में इंटरनेट की अगली एक अरब आबादी भारत, चीन और दक्षिण एशिया के देशों से ही आनी है। ऐसे में इस महत्वपूर्ण विषय पर भारत की भूमिका काफ़ी अहम हो जाती है।

फ़रवरी में यूएन-सीएसटीडी की बैठक में संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देश इंटरनेट गवर्नेंस और बहुपक्षीयता पर अपनी राय रखेंगे। ऐसे में ये देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत और अन्य विकासशील देश इस मुद्दे पर अपनी क्या राय रखते हैं।

कर्ज चुकाने के डर से बदल लिया सेक्‍स, औरत बन गई आदमी

sex change

आज के समय में क्रेडिट कार्ड से शॉपिंग करना आम बात हो गई है। बैंक से कर्ज लेकर और बाद में चुकाते रहने का ये फंडा, काफी प्रचलित है लेकिन इन मोहतरा ने तो कुछ ऐसा किया, जिसे सुनकर आप दंग रह जाएंगे।

क्रेजी न्यूज की खबर के अनुसार, कर्ज चुकाने के बदल इस महिला ने एक ऐसी तरकीब निकाली, जिस पर आप शायद यकीन भी नहीं कर पाएं।

इस महिला ने कर्ज न चुकाना पड़े इसलिए अपना लिंग ही बदल लिया। यानि औरत, आदमी बन गई।

नाताल्या नाम की ये महिला रूस की रहने वाली है। क्रेडिट कार्ड से शॉपिंग करने वाली इस महिला पर करीब लाखों रूपए का कर्ज चढ़ चुका था। इस कर्ज से मुक्ति पाने के लिए उसने अपना लिंग परिवर्तन करा लिया।

वर्तमान में नताल्या से एड्रियन बन चुकी ये महिला ने अपना नया पासपोर्ट भी बनवा लिया था। इतना ही नहीं उसने एड्रियन बनकर भी काफी कर्ज उठा रखा था। बतौर लड़का उसने काफी कपड़ों की खरीदारी की थी।

लेकिन एक दिन खरीदारी के दौरान उसकी हरकतों ने लोगों को थोड़ा पर मजबूर कर दिया। जिसके बाद पूरे मामले की तहकीकात की गई, जिसमें ये कहानी निकलकर सामने आई।

करोड़ों रुपये की एक चीज आपके पास भी है

shri ram sharma acharya pravachan
भगवान ने मनुष्य के साथ कोई पक्षपात नहीं किया है, बल्कि उसे अमानत के रुप में कुछ विभूतियां दी हैं। इन्हें सोचना, विचारना, बोलना भावनाएं, सिद्धियां-विभूतियां कहते हैं। ये सब अमानतें हैं। ये अमानतें मनुष्यों को इसलिए नहीं दी गई हैं कि उनके द्वारा वह सुख-सुविधाएं कमाए और अपने लिए भोग या विलासिता के साधन इकट्ठे करे और अपना अहंकार पूरा करे।

ये सारी की सारी चीजें सिर्फ इसलिए उसको दी गयी हैं कि इन चीजों के माध्यम से वह भगवान की इस दुनिया को अधिक सुन्दर और व्यवस्थित बनाने के लिए प्रयत्न करे। बैंक के खजांची के पास धन रखा रहता है। इसलिए रखा रहता है कि सरकारी प्रयोजनों के लिए इस पैसे को खर्च करे।

उसको उतना ही इस्तेमाल करने का हक है, जितना कि उसको वेतन मिलता है। पुलिस और फौज का जो कमांडर है, उसे अपना वेतन लेकर जितनी सुविधाएं मिली हैं, उसी से काम चलाना होता है। बाकी जो उसके पास बहुत सारी सामर्थ्य, शक्ति और अघिकार मिले हैं वे देश के काम में ही लगाने चाहिए।

हमारी सरकार भगवान हैं और मनुष्य के पास जो कुछ भी विभूतियां, अक्ल और विशेषताएं हैं, वे अपनी सुविधा और शौक-मौज के लिए या निजी अहंकार की तृप्ति के लिए नहीं है। इसलिए जिसके पास जितनी भी विशेषता हैं, समझना चाहिए कि उसे उतना बड़ा जिम्मेदार आदमी समझा गया है।

वह जिम्मेदारी उसे समाज की उतनी ज्यादा सेवा के लिए मिली है। भगवान का बस एक ही उद्देश्य है- नि:स्वार्थ प्रेम। इसके आधार पर भगवान ने मनुष्य को इतना ज्यादा प्यार किया। मनुष्य को उस तरह का मस्तिष्क दिया है, जितना कीमती कम्प्यूटर दुनिया में आज तक नहीं बना।

करोड़ों रुपये की कीमत का है, मानवीय मस्तिष्क। मनुष्य की आंखें, मनुष्य के कान, नाक, वाणी एक से एक चीज ऐसी हैं, जिनकी रुपयों में कीमत नहीं आंकी जा सकती हैं। मनुष्य के सोचने का तरीका इतना बेहतरीन है, जिसके ऊपर सारी दुनिया की दौलत न्योछावर की जा सकती है।

ऐसा कीमती मनुष्य और ऐसा समर्थ मनुष्य- जिस भगवान ने बनाया है, उस भगवान की जरुर ये आकांक्षा रही है कि मेरी इस दुनिया को समुन्नत और सुखी बनाने में यह प्राणी मेरे सहायक के रूप में, और मेरे कर्मचारी के रूप में, मेरे सहयोगी के रुप में मेरे राजकुमार के रुप में काम करेगा और मेरी सृष्टि को समुन्नत रखे मानव जीवन की विशेषताओं का और भगवान् के द्वारा विशेष विभूतियां मनुष्य को देने का एक और भी उद्देश्य है।

जब मनुष्य इस जिम्मेदारी को समझ ले और ये समझ ले कि ‘मैं क्यों जन्म हूं, और यदि मैं मनुष्य के रूप में जन्म लिया है तो उसे सार्थक बनाने के लिए अब क्या करना चाहिए?’

यह बात अगर समझ में आ जाए, तो समझना चाहिए कि इस आदमी का नाम मनुष्य है और इसके भीतर मनुष्यता का उदय हुआ और इसके अंदर भगवान का उदय हो गया और भगवान की वाणी उदय हो गयी, भगवान की विचारधाराएं उदय हो गयी।�

नरेंद्र मोदी के पास है इतनी संपत्ति

संघर्ष से शिखर तक

संघर्ष से शिखर तक

भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेन्द्र भाई मोदी की मेरठ के शताब्दी नगर में होने वाली रैली से पहले उनके संघर्ष से भरे जीवन पर आधारित पुस्तकें भी खूब बिकी।


इनमें मोदी के चाय बेचने वाले बचपन से लेकर प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनने तक की कहानी है। साथ ही गुजरात विधान सभा चुनावों में बताई गई उनकी संपत्ति का ब्योरा भी है।


ऐसी ही एक पुस्तक है नरेन्द्र मोदी - संघर्ष से शिखर तक। इसके पृष्ठ संख्या 19 पर मोदी की संपत्ति का विवरण है।
 

पांच सालों में खूब बढ़ा बैंक बैलेंस

उन्होंने 2007 के विधान सभा चुनाव में दिए गए शपथ पत्र में अपनी संपत्ति 30 लाख बताई थी। 2012 में यह एक करोड़ बताई गई। उनके पास 2007 में सोने की तीन अंगूठी थीं, जो 2012 मे चार हो गई।

इन पांच सालों में मोदी का बैंक बैलेंस भी खूब बढ़ा। 2007 में उनके एकाउंट में 8,55,651 रुपये थे, जबकि 2012 में 27,24,409 हो गए। मोदी ने इन पांच सालों में 39 लाख वेतन लिया।

मोदी के पास एकमात्र प्रोपर्टी गांधीनगर में 330 वर्ग मीटर का घर है जो उन्होंने 2002 में खरीदा था। उन्होंने 2007 में नेशनल सेविंग सर्टिफिकेट में 3,39,575 रुपये निवेश किया, जो 2012 में बढ़कर 4,00,917 हो गया।
  

कहीं साधु न बन जाए मोदी

पुस्तक में मोदी के बारे में और भी जानकारी हैं। गुजरात के वड़नगर गांव में 17 सितंबर 1950 को जन्मे मोदी ने राजनीति शास्त्र में एमए किया है। उनके पिता दामोदर दास मूलचंद मोदी का 1989 में निधन हो गया। छह भाई बहनों में मोदी तीसरे नंबर के हैं। उनके बड़े भाई सोमभाई मोदी आज भी पैतृक गांव में रहते हैं।

किताब में एक दिलचस्प किस्सा बताया गया है। मोदी को 1958 में आठ साल की उम्र में ही गुजरात के प्रांत प्रचारक लक्ष्मण राव इनामदार उर्फ वकील साहब ने स्वयंसेवक की शपथ दिलवाई थी।

आरएसएस से जुड़ने के बाद मोदी ने नमक और तेल खाना बंद कर दिया था। इससे उनकी मां हीराबेन और भाई प्रह्लाद डर गए थे कि कहीं नरेंद्र साधु बनने तो नहीं जा रहे।