18 February 2014
3,999 रुपए में सरकारी टैबलेट 4 जी सपोर्ट के साथ
टीम डिजिटल
मंगलवार, 18 फरवरी 2014
अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated @ 1:01 PM IST
बहुप्रतीक्षित आकाश 4 टैबलेट 3,999 रुपए की कीमत में मिलेगा। नई जनरेशन का यह टैबलेट मार्च तक उपलबध भी करा दिया जाएगा।
इस टैबलेट के टेंडर जारी कर दिए गए हैं ये टैबलेट एक से डेढ़ महीने के अंदर बाजार में उपलब्ध करा दिया जाएगा।आकाश 4 टैबलेट में 7 इंच की स्क्रेच रेजिस्टेंट कैपेसिटिव टच स्क्रीन दी गई है। इसके अलावा इसमें कनेक्टिविटी के लिए वाई-फाई, 2जी, 3जी और 4जी नेटवर्क सपोर्ट के विकल्प मौजूद होंगे।
आकाश 4 टैबलेट में 4जीबी की इंटरनल मैमोरी है जिसको माइक्रो एसडी कार्ड के जरिए 32जीबी तक बढ़ाया जा सकता है। इसके अलावा इसमें फ्रंट फेसिंग कैमरा भी दिया जा रहा है।
1,199 रुपए में हांगकांग की कंपनी ने भारत में लॉन्च किया फोन
हांगकांग की स्मार्टफोन निर्माता कंपनी सनस्ट्राइक टेलीकॉम ने रेज ऐस (Rage ACE) नाम का मोबाइल फोन भारत में लॉन्च किया है।
सनस्ट्राइक टेलीकॉम पहले से ही भारत में सेमी अर्बन (Semi Urban) उपभोक्ताओं को ध्यान में रखकर बजट फोन उपलब्ध कराता रहा है।
सनस्ट्राइक द्वारा ऑप्टिमा स्मार्ट (Optima Smart) सीरीज में लॉन्च किए गए रेज ऐस मोबाइल फोन को इस बार भी भारतीय उपभोक्ताओं को ध्यान में रखकर बनाया गया है।
स्लीम बॉडी (Slim Body) तथा खूबसूरत डिजाइन के साथ ही रेज ऐस फोन को किफायती कीमत के साथ बाजार में पेश किया गया है। भारतीय बाजार में इस फोन की कीमत 1,199 रुपए है।
कंपनी का कहना है कि कई बार उपभोक्ताओं को कम कीमत में फीचर्स से लैस माबाइल फोन लेने होते हैं जो कि बाजार में कम ही उपलब्ध हैं इसीलिए कंपनी ने उपभोक्ताओं की जरूरत और बजट के अनुसार यह फोन लॉन्च किया है।
इस फोन में 2.4 इंच की एलसीडी (LCD) स्क्रीन दी गई है तथा डुअल सिम आधारित इस फोन में पावर बैकअप के लिए 1200 एमएएच बैटरी दी गई है।
रेज ऐस में कई फीचर्स का इस्तेमाल किया गया है जैसे ब्लूटूथ, एफएम, एमपी3 तथा एमपी4 प्लेयर। इसके अतिरिक्त डिजीटल कैमरा, वीडियो रिकॉर्डिंग तथा जीपीआएस और वैप की भी सुविधा शामिल है।
काश, उन्होंने थोड़ा इतिहास पढ़ा होता
| तवलीन सिंह |
अरविंद केजरीवाल को समझना है, तो उनके तमाशों पर न
जाएं। उनकी किताब स्वराज पढ़ें। मैंने पिछले हफ्ते यह किताब पढ़ी। सच तो यह
है कि इस किताब के बारे में मैं जानती तक नहीं थी। जानकारी मिली मुझे
इंडियन एक्सप्रेस के संपादक शेखर गुप्ता के एक लेख से। लेख पढ़ने के बाद
मैंने किताब खरीदी और उसे ध्यान से पढ़ा। पढ़ने के बाद मुझे यकीन हो गया कि
केजरीवाल साहिब या तो आर्थिक या राजनीतिक मामलों में बिल्कुल नादान हैं या
उन्होंने जान-बूझकर अपने राजनीतिक जीवन की इमारत कई झूठों पर खड़ी की है।
केजरीवाल साहिब लिखते हैं कि भारत की स्वाधीनता और धन पर कब्जा कर चुकी हैं विदेशी कंपनियां और विदेशी शक्तियां। यह बात साबित करने के लिए उदाहरण देते हैं अमेरिका के साथ भारत सरकार के परमाणु समझौते और भोपाल गैस त्रासदी का। दोनों मामलों में दूर-दूर का रिश्ता नहीं है। भोपाल में पीड़ितों को मुआवजा नहीं मिला, तो भारत सरकार की लापरवाही के कारण। परमाणु समझौते की बात और है। यहां हमारी सरकार ने देश के हित में काम किया, क्योंकि इस समझौते से भारत को एक परमाणु शक्ति का दर्जा मिला। इस पर ऐतराज किया था पाकिस्तान ने और अमेरिका से शिकायत की कि उसने अपने सबसे वफादार दोस्त के साथ बेवफाई की है। इसके बावजूद अमेरिका ने उसके साथ परमाणु समझौता नहीं किया। अमेरिका ने स्पष्ट किया कि पाकिस्तान इसके लायक नहीं है, क्योंकि उसने अपनी परमाणु जानकारी अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचने की कोशिश की है। शायद उस समय इन बातों के बारे में केजरीवाल साहिब जानते नहीं थे, क्योंकि उस समय वह समाज सेवक थे, राजनेता नहीं। राजनीति में आने से पहले थोड़ा-सा इतिहास पढ़ लिया होता उन्होंने, तो अच्छा रहता।
केजरीवाल की आर्थिक सोच की बुनियाद यह है कि भारत के उद्योगपतियों में ईमानदारी का अभाव है और उनके हाथों में सौंप दी हैं भ्रष्ट अधिकारियों ने देश के वन, नदियां और खदानें। जबकि सच यह है कि इन चीजों पर शिकंजा रहा है सरकारी अधिकारियों का, राजनेताओं का। इसका इन्होंने दुरुपयोग ऐसा किया है कि शायद ही कोई नदी बची है इस बदकिस्मत देश में जो प्रदूषित नहीं हो चुकी है। गंगा और यमुना जैसी पवित्र नदियों की सफाई करने के लिए आवाज उठाई महंतों ने, हिंदू संगठनों ने, उद्योगपतियों और बुद्धिजीवियों ने, पर इन नदियों को साफ करने का काम सरकारी अधिकारियों ने अपने हाथों में रखा।
जंगलों को तबाह किया सरकारी अधिकारियों ने, और अगर कोयले की कुछ खदानें सौंपी गई उद्योगपतियों को, तो इसलिए कि सरकारी अधिकारियों ने इन खदानों को बर्बाद करने का काम किया है। ऐसा नहीं है कि केजरीवाल साहिब जानते नहीं हैं कि सरकारी महकमों में कितना भ्रष्टाचार है। लेकिन सुझाव उनका क्या है? इन्हीं के हाथों में रहना चाहिए देश का धन और इन पर निगरानी रखेंगे लोकपाल साहिब। क्या भ्रष्टाचार रोकने के लिए कानून कम हैं इस देश में? क्या अदालतें नहीं हैं? समस्या यह है कि इस देश की कानून-व्यवस्था बैलगाड़ी की रफ्तार से चलती है। लोकपाल भी तो इसी रफ्तार से चलेंगे न? केजरीवाल की राजनीतिक सोच का आधार यह है कि ग्राम सभाओं को पूरा अधिकार मिलना चाहिए कानून बनाने का और विकास के कार्य करने का। उनकी इस बात से मैं सहमत हूं। लोकतंत्र की जड़ें यदि मजबूत करनी है, तो पंचायतों को मिलने चाहिए टैक्स वसूलने का अधिकार, गांवों के विकास में दखल देने के पूरे अधिकार। लेकिन शहरी मध्यवर्गीय केजरीवाल कुछ ज्यादा ही भरोसा करते हैं देश के देहाती आम आदमी में। भूल जाते हैं शायद कि अगर इन पर नियंत्रण न हो कुछ हद तक राज्य और केंद्र सरकारों का, तो वही जातिवाद पनप सकता है, जिसने सदियों से दलितों और छोटी जातियों को बुनियादी इन्सानी हक तक नहीं दिए थे।
केजरीवाल साहिब अगर कॉलेज के विद्यार्थी होते और यह किताब लिखते, तो यह लेखिका उनकी तारीफ करती। लेकिन वह विद्यार्थी नहीं हैं। वह जनलोकपाल विधेयक पेश करने की जिद में मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ चुके हैं और खुद को इस तरह पेश कर रहे हैं, मानो भ्रष्टाचार मिटाकर ही दम लेंगे। ऐसी किताब लिखने से पहले अगर उन्होंने इतिहास पढ़ लिया होता, तो उनकी बातों में वजन ज्यादा होता।
केजरीवाल साहिब लिखते हैं कि भारत की स्वाधीनता और धन पर कब्जा कर चुकी हैं विदेशी कंपनियां और विदेशी शक्तियां। यह बात साबित करने के लिए उदाहरण देते हैं अमेरिका के साथ भारत सरकार के परमाणु समझौते और भोपाल गैस त्रासदी का। दोनों मामलों में दूर-दूर का रिश्ता नहीं है। भोपाल में पीड़ितों को मुआवजा नहीं मिला, तो भारत सरकार की लापरवाही के कारण। परमाणु समझौते की बात और है। यहां हमारी सरकार ने देश के हित में काम किया, क्योंकि इस समझौते से भारत को एक परमाणु शक्ति का दर्जा मिला। इस पर ऐतराज किया था पाकिस्तान ने और अमेरिका से शिकायत की कि उसने अपने सबसे वफादार दोस्त के साथ बेवफाई की है। इसके बावजूद अमेरिका ने उसके साथ परमाणु समझौता नहीं किया। अमेरिका ने स्पष्ट किया कि पाकिस्तान इसके लायक नहीं है, क्योंकि उसने अपनी परमाणु जानकारी अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचने की कोशिश की है। शायद उस समय इन बातों के बारे में केजरीवाल साहिब जानते नहीं थे, क्योंकि उस समय वह समाज सेवक थे, राजनेता नहीं। राजनीति में आने से पहले थोड़ा-सा इतिहास पढ़ लिया होता उन्होंने, तो अच्छा रहता।
केजरीवाल की आर्थिक सोच की बुनियाद यह है कि भारत के उद्योगपतियों में ईमानदारी का अभाव है और उनके हाथों में सौंप दी हैं भ्रष्ट अधिकारियों ने देश के वन, नदियां और खदानें। जबकि सच यह है कि इन चीजों पर शिकंजा रहा है सरकारी अधिकारियों का, राजनेताओं का। इसका इन्होंने दुरुपयोग ऐसा किया है कि शायद ही कोई नदी बची है इस बदकिस्मत देश में जो प्रदूषित नहीं हो चुकी है। गंगा और यमुना जैसी पवित्र नदियों की सफाई करने के लिए आवाज उठाई महंतों ने, हिंदू संगठनों ने, उद्योगपतियों और बुद्धिजीवियों ने, पर इन नदियों को साफ करने का काम सरकारी अधिकारियों ने अपने हाथों में रखा।
जंगलों को तबाह किया सरकारी अधिकारियों ने, और अगर कोयले की कुछ खदानें सौंपी गई उद्योगपतियों को, तो इसलिए कि सरकारी अधिकारियों ने इन खदानों को बर्बाद करने का काम किया है। ऐसा नहीं है कि केजरीवाल साहिब जानते नहीं हैं कि सरकारी महकमों में कितना भ्रष्टाचार है। लेकिन सुझाव उनका क्या है? इन्हीं के हाथों में रहना चाहिए देश का धन और इन पर निगरानी रखेंगे लोकपाल साहिब। क्या भ्रष्टाचार रोकने के लिए कानून कम हैं इस देश में? क्या अदालतें नहीं हैं? समस्या यह है कि इस देश की कानून-व्यवस्था बैलगाड़ी की रफ्तार से चलती है। लोकपाल भी तो इसी रफ्तार से चलेंगे न? केजरीवाल की राजनीतिक सोच का आधार यह है कि ग्राम सभाओं को पूरा अधिकार मिलना चाहिए कानून बनाने का और विकास के कार्य करने का। उनकी इस बात से मैं सहमत हूं। लोकतंत्र की जड़ें यदि मजबूत करनी है, तो पंचायतों को मिलने चाहिए टैक्स वसूलने का अधिकार, गांवों के विकास में दखल देने के पूरे अधिकार। लेकिन शहरी मध्यवर्गीय केजरीवाल कुछ ज्यादा ही भरोसा करते हैं देश के देहाती आम आदमी में। भूल जाते हैं शायद कि अगर इन पर नियंत्रण न हो कुछ हद तक राज्य और केंद्र सरकारों का, तो वही जातिवाद पनप सकता है, जिसने सदियों से दलितों और छोटी जातियों को बुनियादी इन्सानी हक तक नहीं दिए थे।
केजरीवाल साहिब अगर कॉलेज के विद्यार्थी होते और यह किताब लिखते, तो यह लेखिका उनकी तारीफ करती। लेकिन वह विद्यार्थी नहीं हैं। वह जनलोकपाल विधेयक पेश करने की जिद में मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ चुके हैं और खुद को इस तरह पेश कर रहे हैं, मानो भ्रष्टाचार मिटाकर ही दम लेंगे। ऐसी किताब लिखने से पहले अगर उन्होंने इतिहास पढ़ लिया होता, तो उनकी बातों में वजन ज्यादा होता।
ये तो बेच रही हैं, पर हर कोई नहीं खरीद सकता इनकी वर्जिनिटी
टीम डिजिटल
मंगलवार, 18 फरवरी 2014
अमर उजाला, दिल्ली
Updated @ 1:20 PM IST
कौमार्यता की बोली
संभव है ये आपने पहली बार सुना हो लेकिन पिछले साल कई ऐसे मामले सामने आए, जिसमें लड़कियों ने अपनी कौमार्यता की बोली लगाई।ये बोली किसी बंद कमरे में नहीं बल्कि सोशल नेटवर्किंग साइट पर लगाई गई। आपको ये सुनकर आश्चर्य हो सकता है लेकिन सच्चाई ये है कि कौमार्यता की इस बोली में कई बड़े उद्योगपतियों और नामी लोगों ने हिस्सा लिया।
यहां हम कुछ ऐसे ही मामलों का जिक्र कर रहे हैं, जिसमें इन लड़कियों ने अपनी वर्जिनिटी की बोली लगाई। पर आपको ये जरूर बताना चाहेंगे कि इसके लिए कीमत दे पाना सबके बस की बात नहीं। ये रफैला फिको है।
कैथी कॉबलर्सन
ये मामला साल 2004 का है। 24 वर्षीय कैथी टेक्सास की रहने वाली हैं। वर्जिनिटी बेचने के लिए उन्होंने ई-बे पर एक विज्ञापन दिया था जिसमें उन्होंने इसके लिए उन्होंने 61 लाख रुपए की रकम तय की थी।हालांकि ये निलामी पूरी नहीं हो सकी थी लेकिन इस बात की जानकारी नहीं है कि इस लड़की ने दोबारा इस तरह की कोई निलामी की या नहीं।
रोजी रीड
ये मामला भी 2004 का ही है। लंदन की रोजी ने एक बीडर को आठ लाख में अपना शरीर बेचा था। हालांकि ये लड़की समलैंगिक है और जिस दौरान वो इस शख्स के साथ कमरे में थी उसकी समलैंगिंक दोस्त बाहर उसका इंतजार कर रही थी।ग्रेसिएला याताको
साल 2005 में पेरू की ग्रेसिएला ने मां की दवाइयों और छोटे भाई को मदद करने के लिए अपनी वर्जिनिटी की निलामी की थी। जिसके बदले उसे आठ करोड़ रुपए मिले थे।पढ़ाई के लिए की नीलामी
साल 2009 में एलिना ने अपनी कंप्यूटर की पढ़ाई पूरी करने के लिए वर्जिनिटी निलाम की थी। इटली के एक शख्स ने इस निलामी में सबसे ऊंची कीमत लगाई थी।हालांकि एलिना का कहना था कि वो अभी भी वर्जिन है। इसके लिए उसने दो बाद मेडिकल चेक-अप भी कराया था।
कैटरीना मिलगिरोनी
साल 2012 में ब्राजील की इस लड़की ने ऑनलाइन अपनी वर्जिनिटी नीलाम की थी। जापान के एक शख्स ने इस नीलामी में सबसे ऊंची बोली लगाई थी।हालांकि इसने भी एलिना जैसा ही दावा किया था और इसीलिए दोबारा नीलामी के लिए विज्ञापन दिया।
Subscribe to:
Posts (Atom)
