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02 April 2011

नवरात्र--नवरात्रि-- एक हिंदू पर्व

नवरात्र : 9 दिन, 9 देवी
नवरात्र के 9 दिन देवी के विभिन्न स्वरूपों की उपासना के लिए निर्धारित हैं। ये देवियां भक्तों की पूजा से प्रसन्न होकर उनकी कामनाएं पूर्ण करती हैं।

शैलपुत्री: पहले स्वरूप में मां पर्वतराज हिमालय की पुत्री पार्वती के रूप में विराजमान हैं। नंदी नामक वृषभ पर सवार 'शैलपुत्री' के दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प है। शैलराज हिमालय की कन्या होने के कारण इन्हें शैलपुत्री कहा गया। इन्हें समस्त वन्य जीव-जंतुओं की रक्षक माना जाता है। दुर्गम स्थलों पर स्थित बस्तियों में सबसे पहले शैलपुत्री के मंदिर की स्थापना इसीलिए की जाती है कि वह स्थान सुरक्षित रह सके।

उपासना मंत्र : वन्दे वांछितलाभाय चन्दार्धकृतशेखराम्। वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्।।

ब्रह्मचारिणी: दूसरी दुर्गा 'ब्रह्मचारिणी' को समस्त विद्याओं की ज्ञाता माना गया है। इनकी आराधना से अनंत फल की प्राप्ति और तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम जैसे गुणों की वृद्धि होती है। 'ब्रह्मचारिणी' का अर्थ हुआ, तप की चारिणी यानी तप का आचरण करने वाली। यह स्वरूप श्वेत वस्त्र पहने दाएं हाथ में अष्टदल की माला और बाएं हाथ में कमंडल लिए हुए सुशोभित है। कहा जाता है कि देवी ब्रह्मचारिणी अपने पूर्व जन्म में पार्वती स्वरूप में थीं। वह भगवान शिव को पाने के लिए 1000 साल तक सिर्फ फल खाकर रहीं और 3000 साल तक शिव की तपस्या सिर्फ पेड़ों से गिरी पत्तियां खाकर की। कड़ी तपस्या के कारण उन्हें ब्रह्मचारिणी कहा गया।

उपासना मंत्र: दधाना कपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू। देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।

चंद्रघंटा: शक्ति के रूप में विराजमान मां चंद्रघंटा मस्तक पर घंटे के आकार के चंद्रमा को धारण किए हुए हैं। देवी का यह तीसरा स्वरूप भक्तों का कल्याण करता है। इन्हें ज्ञान की देवी भी माना गया है। बाघ पर सवार मां चंद्रघंटा के चारों तरफ अद्भुत तेज है। इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है। यह तीन नेत्रों और दस हाथों वाली हैं। इनके दस हाथों में कमल, धनुष-बाण, कमंडल, तलवार, त्रिशूल और गदा जैसे अस्त्र-शस्त्र हैं। कंठ में सफेद पुष्पों की माला और शीर्ष पर रत्नजडि़त मुकुट विराजमान हैं। यह साधकों को चिरायु, आरोग्य, सुखी और संपन्न होने का वरदान देती हैं। कहा जाता है कि यह हर समय दुष्टों के संहार के लिए तैयार रहती हैं और युद्ध से पहले उनके घंटे की आवाज ही राक्षसों को भयभीत करने के लिए काफी होती है।

उपासना मंत्र: पिण्डज प्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसादं तनुते महयं चन्दघण्टेति विश्रुता।।

कुष्मांडा: चौथे स्वरूप में देवी कुष्मांडा भक्तों को रोग, शोक और विनाश से मुक्त करके आयु, यश, बल और बुद्धि प्रदान करती हैं। यह बाघ की सवारी करती हुईं अष्टभुजाधारी, मस्तक पर रत्नजडि़त स्वर्ण मुकुट पहने उज्जवल स्वरूप वाली दुर्गा हैं। इन्होंने अपने हाथों में कमंडल, कलश, कमल, सुदर्शन चक्र, गदा, धनुष, बाण और अक्षमाला धारण किए हैं। अपनी मंद मुस्कान हंसी से ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इनका नाम कुष्मांडा पड़ा। कहा जाता है कि जब दुनिया नहीं थी, तो चारों तरफ सिर्फ अंधकार था। ऐसे में देवी ने अपनी हल्की-सी हंसी से ब्रह्मांड की उत्पत्ति की। वह सूरज के घेरे में रहती हैं। सिर्फ उन्हीं के अंदर इतनी शक्ति है, जो सूरज की तपिश को सहन कर सकें। मान्यता है कि वह ही जीवन की शक्ति प्रदान करती हैं।

उपासना मंत्र: सुरासम्पूर्णकलशं रूधिराप्लुतमेव च। दधाना हस्तपद्माभ्यां कुष्मांडा शुभदास्तुमे।।

स्कन्दमाता: भगवान स्कन्द (कार्तिकेय) की माता होने के कारण इस पांचवें स्वरूप को स्कन्दमाता के नाम से जाना जाता है। यह कमल के आसन पर विराजमान हैं, इसलिए इन्हें पद्मासन देवी भी कहा जाता है। इनका वाहन भी सिंह है। इन्हें कल्याणकारी शक्ति की अधिष्ठात्री कहा जाता है। यह दोनों हाथों में कमलदल लिए हुए और एक हाथ से अपनी गोद में ब्रह्मस्वरूप सनतकुमार को थामे हुए हैं। स्कन्द माता की गोद में उन्हीं का सूक्ष्म रूप छह सिर वाली देवी का है। अत: इनकी पूजा-अर्चना में मिट्टी की 6 मूर्तियां सजाना जरूरी माना गया हैं।

उपासना मंत्र: सिंहासानगता नितयं पद्माश्रितकरद्वया। शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी।।

कात्यायनी: यह दुर्गा देवताओं और ऋषियों के कार्यों को सिद्ध करने लिए महर्षि कात्यायन के आश्रम में प्रकट हुईं। उनकी पुत्री होने के कारण इनका नाम कात्यायनी पड़ा। देवी कात्यायनी दानवों तथा पापी जीवियों का नाश करने वाली हैं। वैदिक युग में ये ऋषि-मुनियों को कष्ट देने वाले दानवों को अपने तेज से ही नष्ट कर देती थीं। यह सिंह पर सवार, चार भुजाओं वाली और सुसज्जित आभा मंडल वाली देवी हैं। इनके बाएं हाथ में कमल और तलवार व दाएं हाथ में स्वस्तिक और आशीर्वाद की मुद्रा है।

उपासना मंत्र: चंद्रहासोज्जवलकरा शाइलवरवाहना। कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी।।

कालरात्रि: सातवां स्वरूप देखने में भयानक है, लेकिन सदैव शुभ फल देने वाला होता है। इन्हें 'शुभंकरी' भी कहा जाता है। 'कालरात्रि' केवल शत्रु एवं दुष्टों का संहार करती हैं। यह काले रंग-रूप वाली, केशों को फैलाकर रखने वाली और चार भुजाओं वाली दुर्गा हैं। यह वर्ण और वेश में अर्द्धनारीश्वर शिव की तांडव मुद्रा में नजर आती हैं। इनकी आंखों से अग्नि की वर्षा होती है। एक हाथ से शत्रुओं की गर्दन पकड़कर दूसरे हाथ में खड्ग-तलवार से उनका नाश करने वाली कालरात्रि विकट रूप में विराजमान हैं। इनकी सवारी गधा है, जो समस्त जीव-जंतुओं में सबसे अधिक परिश्रमी माना गया है।

उपासना मंत्रः एक वेधी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता। लम्बोष्ठी कणिर्काकणी तैलाभ्यक्तशरीरिणी।।
वामपदोल्लसल्लोहलताकण्टक भूषणा। वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी।।

महागौरी: आठवें दिन महागौरी की उपासना की जाती है। इससे सभी पाप धुल जाते हैं। देवी ने कठिन तपस्या करके गौर वर्ण प्राप्त किया था। उत्पत्ति के समय 8 वर्ष की आयु की होने के कारण नवरात्र के आठवें दिन इनकी पूजा की जाती है। भक्तों के लिए यह अन्नपूर्णा स्वरूप हैं, इसलिए अष्टमी के दिन कन्याओं के पूजन का विधान है। यह धन, वैभव और सुख-शांति की अधिष्ठात्री देवी हैं। इनका स्वरूप उज्जवल, कोमल, श्वेतवर्णा तथा श्वेत वस्त्रधारी है। यह एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में डमरू लिए हुए हैं। गायन और संगीत से प्रसन्न होने वाली 'महागौरी' सफेद वृषभ यानि बैल पर सवार हैं।

उपासना मंत्र: श्वेते वृषे समरूढ़ा श्वेताम्बराधरा शुचि:। महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा।।

सिद्धिदात्री: नवीं शक्ति 'सिद्धिदात्री' सभी सिद्धियों को प्रदान करने वाली हैं। इनकी उपासना से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। कमल के आसन पर विराजमान देवी हाथों में कमल, शंख, गदा, सुदर्शन चक्र धारण किए हुए हैं। भक्त इनकी पूजा से यश, बल और धन की प्राप्ति करते हैं। सिद्धिदात्री की पूजा के लिए नवाहन का प्रसाद, नवरस युक्त भोजन तथा नौ प्रकार के फल-फूल आदि का अर्पण करना चाहिए। इस तरह नवरात्र का समापन करने वाले भक्तों को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। सिद्धिदात्री देवी सरस्वती का भी स्वरूप हैं, जो श्वेत वस्त्रालंकार से युक्त महाज्ञान और मधुर स्वर से भक्तों को सम्मोहित करती हैं।

उपासना मंत्र : सिद्धगंधर्वयक्षाद्यैरसुरैररमरैरपि। सेव्यमाना सदा भूयात सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।।


नवरात्र का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक रहस्य
नवरात्र शब्द से नव अहोरात्रों  (विशेष रात्रियां) का बोध होता है। इस समय शक्ति के नव रूपों की उपासना की जाती है। 'रात्रि' शब्द सिद्धि का प्रतीक है।

भारत के प्राचीन ऋषियों-मुनियों ने रात्रि को दिन की अपेक्षा अधिक महत्व दिया है, इसलिए दीपावली, होलिका, शिवरात्रि और नवरात्र आदि उत्सवों को रात में ही मनाने की परंपरा है। यदि रात्रि का कोई विशेष रहस्य न होता, तो ऐसे उत्सवों को रात्रि न कह कर दिन ही कहा जाता। लेकिन नवरात्र के दिन, नवदिन नहीं कहे जाते।

मनीषियों ने वर्ष में दो बार नवरात्रों का विधान बनाया है। विक्रम संवत के पहले दिन अर्थात चैत्र मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (पहली तिथि) से नौ दिन अर्थात नवमी तक। और इसी प्रकार ठीक छह मास बाद आश्विन मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से महानवमी अर्थात विजयादशमी के एक दिन पूर्व तक। परंतु सिद्धि और साधना की दृष्टि से शारदीय नवरात्रों को ज्यादा महत्वपूर्ण माना गया है।
इन नवरात्रों में लोग अपनी आध्यात्मिक और मानसिक शक्ति संचय करने के लिए अनेक प्रकार के व्रत, संयम, नियम, यज्ञ, भजन, पूजन, योग साधना आदि करते हैं। कुछ साधक इन रात्रियों में पूरी रात पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर आंतरिक त्राटक या बीज मंत्रों के जाप द्वारा विशेष सिद्धियां प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।

नवरात्रों में शक्ति के 51 पीठों पर भक्तों का समुदाय बड़े उत्साह से शक्ति की उपासना के लिए एकत्रित होता है। जो उपासक इन शक्ति पीठों पर नहीं पहुंच पाते, वे अपने निवास स्थल पर ही शक्ति का आह्वान करते हैं।

आजकल अधिकांश उपासक शक्ति पूजा रात्रि में नहीं, पुरोहित को दिन में ही बुलाकर संपन्न करा देते हैं। सामान्य भक्त ही नहीं, पंडित और साधु-महात्मा भी अब नवरात्रों में पूरी रात जागना नहीं चाहते। न कोई आलस्य को त्यागना चाहता है। बहुत कम उपासक आलस्य को त्याग कर आत्मशक्ति, मानसिक शक्ति और यौगिक शक्ति की प्राप्ति के लिए रात्रि के समय का उपयोग करते देखे जाते हैं।
मनीषियों ने रात्रि के महत्व को अत्यंत सूक्ष्मता के साथ वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में समझने और समझाने का प्रयत्न किया। रात्रि में प्रकृति के बहुत सारे अवरोध खत्म हो जाते हैं। आधुनिक विज्ञान भी इस बात से सहमत है। हमारे ऋषि - मुनि आज से कितने ही हजारों वर्ष पूर्व ही प्रकृति के इन वैज्ञानिक रहस्यों को जान चुके थे।

दिन में आवाज दी जाए तो वह दूर तक नहीं जाएगी , किंतु रात्रि को आवाज दी जाए तो वह बहुत दूर तक जाती है। इसके पीछे दिन के कोलाहल के अलावा एक वैज्ञानिक तथ्य यह भी है कि दिन में सूर्य की किरणें आवाज की तरंगों और रेडियो तरंगों को आगे बढ़ने से रोक देती हैं। रेडियो इस बात का जीता - जागता उदाहरण है। कम शक्ति के रेडियो स्टेशनों को दिन में पकड़ना अर्थात सुनना मुश्किल होता है , जबकि सूर्यास्त के बाद छोटे से छोटा रेडियो स्टेशन भी आसानी से सुना जा सकता है।

वैज्ञानिक सिद्धांत यह है कि सूर्य की किरणें दिन के समय रेडियो तरंगों को जिस प्रकार रोकती हैं , उसी प्रकार मंत्र जाप की विचार तरंगों में भी दिन के समय रुकावट पड़ती है। इसीलिए ऋषि - मुनियों ने रात्रि का महत्व दिन की अपेक्षा बहुत अधिक बताया है। मंदिरों में घंटे और शंख की आवाज के कंपन से दूर - दूर तक वातावरण कीटाणुओं से रहित हो जाता है। यह रात्रि का वैज्ञानिक रहस्य है। जो इस वैज्ञानिक तथ्य को ध्यान में रखते हुए रात्रियों में संकल्प और उच्च अवधारणा के साथ अपने शक्तिशाली विचार तरंगों को वायुमंडल में भेजते हैं , उनकी कार्यसिद्धि अर्थात मनोकामना सिद्धि , उनके शुभ संकल्प के अनुसार उचित समय और ठीक विधि के अनुसार करने पर अवश्य होती है।

अध्यात्म और साधना का संगम है नवरात्र
कलश स्थापना, देवी दुर्गा की स्तुति, सुमधुर घंटियों की आवाज, धूप-बत्तियों की सुगंध- यह नौ दिनों तक चलने वाले साधना पर्व नवरात्र का चित्रण है। हमारी संस्कृति में नवरात्र पर्व की साधना का विशेष महत्व है। नवरात्र पूजा पर्व वर्ष में दो बार आता है, एक चैत्र माह में, दूसरा आश्विन माह में।

उमंग का संचार

नवरात्र में ईश-साधना और अध्यात्म का अद्भुत संगम होता है। आश्विन माह की नवरात्र में रामलीला, रामायण, भागवत पाठ, अखंड कीर्तन जैसे सामूहिक धार्मिक अनुष्ठान होते है। यही वजह है कि नवरात्र के दौरान प्रत्येक इनसान एक नए उत्साह और उमंग से भरा दिखाई पड़ता है। सच तो यह है कि देवी दुर्गा की पवित्र भक्ति से भक्तगण को सुपथ पर चलने की प्रेरणा मिलती है। नवरात्र के समय ऋतु परिवर्तन होता है। ऐसी मान्यता है कि जब ऋतु परिवर्तन होता है, तो आपके शरीर में भी बदलाव आने लगता है। यहां तक कि अध्यात्म की ओर उन्मुख व्यक्ति की सूक्ष्म आत्मा भी यह परिवर्तन महसूस करने लगती है, जो सकारात्मक होता है। यह आम बात है कि आश्विन और चैत्र महीने में व्यक्ति अपने शरीर के भीतर अनायास ही ज्वार-भाटे जैसी हलचल महसूस करता है। यह शारीरिक और मानसिक स्थिति में विशेष परिवर्तन का प्रतीक है।

ईश्वर का आशीर्वाद

वैसे तो ईश्वर का आशीर्वाद हम पर सदा ही बना रहता है, किन्तु कुछ विशेष अवसरों पर उनके प्रेम, कृपा का लाभ हमें अधिक मिलता है। ऐसे अवसरों को ही पावन पर्व कहा जाता है। पावन पर्व नवरात्र में देवी दुर्गा की कृपा, सृष्टि की सभी रचनाओं पर समान रूप से बरसती है। इसके परिणामस्वरूप ही मनुष्यों को लोक मंगल के क्रिया-कलापों में आत्मिक आनंद की अनुभूति होती है। हमारे ऋषि-मुनियों ने भी इस पर्व में साधना के महत्व पर बल दिया है, इसलिए नवरात्र में आध्यात्मिक तप अवश्य करना चाहिए।

वास्तव में, नवरात्र में सर्दी और गर्मी जैसी मुख्य ऋतुओं का मिलन होता है। उनका मिलन एक प्रकार से वैसा ही संधिकाल है, जैसा कि रात्रि के अंत और दिन के प्रारंभ में प्रभात काल के रूप में उपस्थित होता है। ऋतु संध्या आश्विन और चैत्र में जिन दिनों आती है, उन नौ-नौ दिनों की अवधि को नवरात्र कहते हैं। यही वह समय होता है, जब वातावरण में ईश भक्ति का उमंग और उल्लास का भाव भरने लगता है। इसीलिए अध्यात्म से जुड़े व्यक्तियों के लिए यह समय विशेष रूप से उपयुक्त माना गया है। दरअसल, नवरात्र पर्व पर किस प्रकार साधना करनी चाहिए, यह अलग-अलग व्यक्तियों पर निर्भर करता है। इसमें किसी व्यक्ति के लिए कोई बंधन नहीं होता है।

व्रत-उपवास के लाभ

नवरात्र को ईश्वर की उपासना का पर्व माना गया है। इन दिनों भक्त रामायण व गीता का पाठ करते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस पर्व के दौरान तपस्वियों द्वारा व्रत-उपवास रखने से उन्हे आध्यात्मिक शांति और सुख प्राप्त होता है। नवरात्र के साथ देवी दुर्गा के अवतार की कथा भी जुड़ी हुई है। असुरों से पीड़ित देवता प्रजापति ब्रह्मा के पास जाते हैं और पूछते हैं कि हम सद्गुणों से सम्पन्न होते हुए भी दुष्ट असुरों से हारते क्यों हैं? ब्रह्माजी ने उत्तर दिया, 'संगठन और पराक्रम के अभाव में अन्य गुण निष्प्राण बने रहते हैं।

संकट से मुक्ति पाने और वर्चस्व के लिए संगठित और पराक्रमी बनने के अतिरिक्त और दूसरा कोई मार्ग नहीं है।' देवताओं ने इसी उक्ति का पालन किया और तब जाकर दानवों का पराभव संभव हुआ।

सामूहिक उपासना

नवरात्र पर्व पर यदि देवी की उपासना सामूहिक रूप से की जाए, तो परम आनंद की प्राप्ति होती है। दरअसल, सामूहिक उपासना के पीछे एक संदेश छिपा हुआ है। माना जाता है कि सामूहिक कार्यो से समाज संगठित होता है। जैसा कि हम सभी जानते है कि यदि समाज संगठित होगा, तो संपूर्ण राष्ट्र में एकता स्थापित होगी। इसलिए वर्तमान समय में जब संपूर्ण विश्व में अलगाववाद की समस्या जड़ जमा रही है, नवरात्र पर्व की प्रासंगिकता बढ़ जाती है।

नवरात्र को दो भागों में बांटा जा सकता है। पहले भाग में नवरात्र में की जाने वाली देवी की साधना और उपासना को रखा जा सकता है। दूसरे भाग में व्रत और उपवास की प्रक्रिया रखी जा सकती है। ऐसा माना जाता है कि परमानंद की प्राप्ति तभी संभव है, जब दोनों भागों की प्रक्रियाओं का विधिवत पालन किया जाए।

नवरात्र के नौ दिनों में स्वयं के बुरे विचार, क्रोध, छल-कपट, ईष्र्या आदि जैसे बुरे गुणों पर नियंत्रण किया जाता है। यदि आप इन नौ दिनों में मानव कल्याण में रत रहते है, तो अनुष्ठान का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। आइए, नवरात्र के अवसर पर हम जगत माता देवी दुर्गा से यह प्रार्थना करे :

सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामया:।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दु:ख भाग्यवेत्।

साथ ही, हम यह कामना भी करें कि नवरात्र पर्व सभी साधकों के लिए उज्ज्वल संभावनाएं लेकर आए। ईश्वर गलत मार्ग पर चलने वाले व्यक्तियों को सद्बुद्धि प्रदान करे, ताकि वे कुमार्ग का त्याग कर सन्मार्ग पर चलें।


नवरात्रि
    नवरात्रि एक हिंदू पर्व है। नवरात्रि संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ होता है नौ रातें । यह पर्व साल में दो बार आता है। एक शारदीय नवरात्रि, दूसरा है चैत्रीय नवरात्रि। नवरात्रि के नौ रातो में तीन हिंदू देवियों - पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती के नौ स्वरुपों की पूजा होती है जिन्हे नवदुर्गा कहते हैं ।

    शक्ति की उपासना का पर्व शारदेय नवरात्र प्रतिपदा से नवमी तक निश्चित नौ तिथि, नौ नक्षत्र, नौ शक्तियों की नवधा भक्ति के साथ सनातन काल से मनाया जा रहा है। सर्वप्रथम श्रीरामचंद्रजी ने इस शारदीय नवरात्रि पूजा का प्रारंभ समुद्र तट पर किया था और उसके बाद दसवें दिन लंका विजय के लिए प्रस्थान किया और विजय प्राप्त की । तब से असत्य, अधर्म पर सत्य, धर्म की जीत का पर्व दशहरा मनाया जाने लगा। आदिशक्ति के हर रूप की नवरात्र के नौ दिनों में क्रमशः अलग-अलग पूजा की जाती है। माँ दुर्गा की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री है। ये सभी प्रकार की सिद्धियाँ देने वाली हैं। इनका वाहन सिंह है और कमल पुष्प पर ही आसीन होती हैं । नवरात्रि के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है।

    नवदुर्गा और दस महाविधाओं में काली ही प्रथम प्रमुख हैं। भगवान शिव की शक्तियों में उग्र और सौम्य, दो रूपों में अनेक रूप धारण करने वाली दस महाविधाएँ अनंत सिद्धियाँ प्रदान करने में समर्थ हैं। दसवें स्थान पर कमला वैष्णवी शक्ति हैं, जो प्राकृतिक संपत्तियों की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी हैं। देवता, मानव, दानव सभी इनकी कृपा के बिना पंगु हैं, इसलिए आगम-निगम दोनों में इनकी उपासना समान रूप से वर्णित है। सभी देवता, राक्षस, मनुष्य, गंधर्व इनकी कृपा-प्रसाद के लिए लालायित रहते हैं।
प्रमुख कथा
    लंका-युद्ध में ब्रह्माजी ने श्रीराम से रावण वध के लिए चंडी देवी का पूजन कर देवी को प्रसन्न करने को कहा और बताए अनुसार चंडी पूजन और हवन हेतु दुर्लभ एक सौ आठ नीलकमल की व्यवस्था की गई। वहीं दूसरी ओर रावण ने भी अमरता के लोभ में विजय कामना से चंडी पाठ प्रारंभ किया। यह बात इंद्र देव ने पवन देव के माध्यम से श्रीराम के पास पहुँचाई और परामर्श दिया कि चंडी पाठ यथासभंव पूर्ण होने दिया जाए। इधर हवन सामग्री में पूजा स्थल से एक नीलकमल रावण की मायावी शक्ति से गायब हो गया और राम का संकल्प टूटता-सा नजर आने लगा। भय इस बात का था कि देवी माँ रुष्ट न हो जाएँ। दुर्लभ नीलकमल की व्यवस्था तत्काल असंभव थी, तब भगवान राम को सहज ही स्मरण हुआ कि मुझे लोग 'कमलनयन नवकंच लोचन' कहते हैं, तो क्यों न संकल्प पूर्ति हेतु एक नेत्र अर्पित कर दिया जाए और प्रभु राम जैसे ही तूणीर से एक बाण निकालकर अपना नेत्र निकालने के लिए तैयार हुए, तब देवी ने प्रकट हो, हाथ पकड़कर कहा- राम मैं प्रसन्न हूँ और विजयश्री का आशीर्वाद दिया। वहीं रावण के चंडी पाठ में यज्ञ कर रहे ब्राह्मणों की सेवा में ब्राह्मण बालक का रूप धर कर हनुमानजी सेवा में जुट गए। निःस्वार्थ सेवा देखकर ब्राह्मणों ने हनुमानजी से वर माँगने को कहा। इस पर हनुमान ने विनम्रतापूर्वक कहा- प्रभु, आप प्रसन्न हैं तो जिस मंत्र से यज्ञ कर रहे हैं, उसका एक अक्षर मेरे कहने से बदल दीजिए। ब्राह्मण इस रहस्य को समझ नहीं सके और तथास्तु कह दिया। मंत्र में जयादेवी... भूर्तिहरिणी में 'ह' के स्थान पर 'क' उच्चारित करें, यही मेरी इच्छा है। भूर्तिहरिणी यानी कि प्राणियों की पीड़ा हरने वाली और 'करिणी' का अर्थ हो गया प्राणियों को पीड़ित करने वाली, जिससे देवी रुष्ट हो गईं और रावण का सर्वनाश करवा दिया। हनुमानजी महाराज ने श्लोक में 'ह' की जगह 'क' करवाकर रावण के यज्ञ की दिशा ही बदल दी।
अन्य कथाएं
श्रीनगर के निकट खीर भवानी मंदिर
    इस पर्व से जुड़ी एक अन्य कथा अनुसार देवी दुर्गा ने एक भैंस रूपी असुर अर्थात महिषासुर का वध किया था। पौराणिक कथाओं के अनुसार महिषासुर के एकाग्र ध्यान से बाध्य होकर देवताओं ने उसे अजय होने का वरदान दे दिया। उसको वरदान देने के बाद देवताओं को चिंता हुई कि वह अब अपनी शक्ति का गलत प्रयोग करेगा। और प्रत्याशित प्रतिफल स्वरूप महिषासुर ने नरक का विस्तार स्वर्ग के द्वार तक कर दिया और उसके इस कृत्य को देख देवता विस्मय की स्थिति में आ गए। महिषासुर ने सूर्य, इन्द्र, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, यम, वरुण और अन्य देवताओं के सभी अधिकार छीन लिए हैं और स्वयं स्वर्गलोक का मालिक बन बैठा है। देवताओं को महिषासुर के प्रकोप से पृथ्वी पर विचरण करना पड़ रहा है। तब महिषासुर के इस दुस्साहस से क्रोधित होकर देवताओं ने देवी दुर्गा की रचना की। ऐसा माना जाता है कि देवी दुर्गा के निर्माण में सारे देवताओं का एक समान बल लगाया गया था। महिषासुर का नाश करने के लिए सभी देवताओं ने अपने अपने अस्त्र देवी दुर्गा को दिए थे और कहा जाता है कि इन देवताओं के सम्मिलित प्रयास से देवी दुर्गा और बलवान हो गईं थी। इन नौ दिन देवी-महिषासुर संग्राम हुआ और अन्ततः महिषासुर-वध कर महिषासुर मर्दिनी कहलायीं।

    चौमासे में जो कार्य स्थगित किए गए होते हैं, उनके आरंभ के लिए साधन इसी दिन से जुटाए जाते हैं। क्षत्रियों का यह बहुत बड़ा पर्व है। इस दिन ब्राह्मण सरस्वती-पूजन तथा क्षत्रिय शस्त्र-पूजन आरंभ करते हैं। विजयादशमी या दशहरा एक राष्ट्रीय पर्व है। अर्थात आश्विन शुक्ल दशमी को सायंकाल तारा उदय होने के समय 'विजयकाल' रहता है। यह सभी कार्यों को सिद्ध करता है। आश्विन शुक्ल दशमी पूर्वविद्धा निषिद्ध, परविद्धा शुद्ध और श्रवण नक्षत्रयुक्त सूर्योदयव्यापिनी सर्वश्रेष्ठ होती है। अपराह्न काल, श्रवण नक्षत्र तथा दशमी का प्रारंभ विजय यात्रा का मुहूर्त माना गया है। दुर्गा-विसर्जन, अपराजिता पूजन, विजय-प्रयाग, शमी पूजन तथा नवरात्र-पारण इस पर्व के महान कर्म हैं। इस दिन संध्या के समय नीलकंठ पक्षी का दर्शन शुभ माना जाता है। क्षत्रिय/राजपूतों इस दिन प्रातः स्नानादि नित्य कर्म से निवृत्त होकर संकल्प मंत्र लेते हैं। इसके पश्चात पश्चात देवताओं, गुरुजन, अस्त्र-शस्त्र, अश्व आदि के यथाविधि पूजन की परंपरा है।


चैत्र नवरात्रि व्रत-पूजन का विधान  
आराधना विधि एवं महत्व

व्रत का नामः- चैत्र नवरात्रि
व्रत का पक्ष :- शुक्ल पक्ष
व्रत की तिथिः- प्रतिपदा
व्रत का मासः- चैत्र मास
व्रत की देवीः- श्री भगवती माँ जगदम्बा
पूजा का समयः- प्रातः काल संकल्प के साथ
व्रत का दिनः- चंद्रवार
व्रत की पूजा विधिः- षोड़शोपचार विधि

व्रत की कथाः- माँ दुर्गा द्वारा रक्तबीज, महिषासुर आदि दैत्यों का वध आदि शक्ति माँ दुर्गा की जयकार और भक्त तथा देवगणों की रक्षा व कल्याण। इसी कल्याण के उद्देश्य से प्रतिवर्ष नवरात्रों में माँ की पूजा आराधना व यज्ञानुष्ठानों का आयोजन किया जाता है। दुर्गा सप्तशत‍ी माँ की आराधना का सबसे प्रामाणिक ग्रंथ है।

चैत्र नवरात्रों का महत्व :-
वैदिक ग्रंथों में वर्णन हैं कि जीव व जीवन का आश्रय, इस वसुधा को बचाएँ रखने के लिए युगों से देव व दानवों में ठनी रहीं। देवता जो कि परोपकारी, कल्याणकारी, धर्म, मर्यादा व भक्तों के रक्षक है। वहीं दानव अर्थात्‌ राक्षस इसके विपरीत हैं। इसी क्रम में जब रक्तबीज, महिषासुर आदि दैत्य वरदानी शक्तियों के अभिमान में अत्याचार कर जीवन के आश्रय धरती को और फिर इसके रक्षक देवताओं को भी पीड़ित करने लगे तो देवगणों ने एक अद्भुत शक्ति का सृजन कर उसे नाना प्रकार के अमोघ अस्त्र प्रदान किए। जो आदि शक्ति माँ दुर्गा के नाम से सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त हुईं।

भक्तों की रक्षा व देव कार्य अर्थात्‌ कल्याण के लिए भगवती दुर्गा ने नौ दिनों में नौ रूपों जयंती, मंगला, काली, भद्रकाली कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा, स्वधा को प्रकट किया। जो नौ दिनों तक महाभयानक युद्ध कर शुंभ-निशुंभ, रक्तबीज आदि अनेक दैत्यों का वध कर दिया। भगवती ने भू व देव लोक में पुनः नवचेतना, कल्याण, ओज, तेज, साहस, प्राण व रक्षा शक्ति का संचार कर दिया। बिना शक्ति की इच्छा के एक कण भी नही हिल सकता। त्रैलोक्य दृष्टा भगवान शिव भी (इ की मात्रा, शक्ति) के हटते ही शिव से शव (मुर्दा) बन जाते हैं।

सूर्य, शिव, आदि पुराणों में शिव व शक्ति की परम कल्याणकारी कथाओं का बड़ा अद्भुत व रोचक उल्लेख है।

युग-युगांतरों में विश्व के अनेक हिस्सों में उत्पन्न होने वाली मानव सभ्यता ने सूर्य, चंद्र, ग्रह, नक्षत्र, जल, अग्नि, वायु, आकाश, पृथ्वी, पेड़-पौधे, पर्वत व सागर की क्रियाशीलता में परम शक्ति का कहीं न कहीं आभास मिलता है। उस शक्ति के आश्रय व कृपा से ही देव, दनुज, मनुज, नाग, किन्नर, गंधर्व, पितृ, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी व कीट आदि चलायमान हैं। ऐसी परम शक्ति की सत्ता का सतत्‌ अनुभव करने वाली सुसंस्कृत, पवित्र, वेदगर्भा भारतीय भूमि धन्य है।

सनातन हिन्दू धर्म जिसमें गृहस्थ जीवन को बसाना, सुयोग्य जीवन साथी के साथ शास्त्रीय मर्यादा में विवाह आदि रचाना एक धार्मिक कृत्य है जिसके सूत्रों में बंध कर व्यक्ति धर्म, अर्थ, काम तथा जीवन के अन्तिम लक्ष्य मोक्ष को भी प्राप्त कर लेता है।

हमारे वेद, पुराण व शास्त्र गवाह हैं कि जब-जब किसी आसुरी शक्ति ने अत्याचार व प्राकृतिक आपदाओं द्वारा मानव जीवन को तबाह करने की कोशिश की है, तब-तब किसी न किसी दैवीय शक्ति का अवतरण हुआ। इसी प्रकार जब महिषासुरादि जैसे दैत्यों के अत्याचार से भू व देव लोक व्याकुल हो उठे तो परमेश्वर की प्रेरणा से सभी देव गणों ने एक अद्भुत शक्ति संपन्न देवी का सृजन किया जो आदि शक्ति माँ जगदम्बा के नाम से सम्पूर्ण ब्रह्मांड की अधिष्ठात्री बनीं। जिन्होंने दैत्यों का वध कर भू व देव लोक में पुनः प्राणशक्ति का संचार कर दिया।

शक्ति की परम कृपा प्राप्त करने हेतु सम्पूर्ण भारत में नवरात्रि का पर्व वर्ष में दो बार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तथा आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को बड़ी श्रद्धा, भक्ति व हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। जिसे चैत्र व शारदीय नवरात्रि के नाम से जाना जाता है।

इस वर्ष नवरात्रि का पवित्र पर्व 4 अप्रैल 2011, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा; सोमवार से प्रारंभ हो रहा है। जीवन की रीढ़ कृषि व प्राणों की रक्षा हेतु इन दोनों ही ऋतुओं में लहलहाती हुई फसलें खेत-खलिहान में आ जाती हैं। इन फसलों के रखरखाव व कीट पंतगों से रक्षा हेतु, परिवार को सुखी व समृद्ध बनाने तथा कष्टों, दुःख-दरिद्रता से छुटकारा पाने के लिए सभी वर्ग के लोग नौ दिनों तक विशेष सफाई तथा पवित्रता को महत्व देते हुए नौ देवियों की आराधना, हवनादि यज्ञ क्रियाएँ करते हैं।

यज्ञ क्रियाओं द्वारा पुनः वर्षा होती है जो धन, धान्य से परिपूर्ण करती है तथा अनेक प्रकार की संक्रमित बीमारियों का अंत भी करती है। इस कर्मभूमि के सपूतों के लिए माँ 'दुर्गा' की पूजा व आराधना ठीक उसी प्रकार कल्याणकारी है, जिस प्रकार घने तिमिर अर्थात्‌ अंधेरे में घिरे हुए संसार के लिए भगवान सूर्य की एक किरण।

जिस व्यक्ति को बार-बार कर्म करने पर भी सफलता न मिलती हो, उचित आचार-विचार के बाद भी रोग पीछा न छोड़ते हो, अविद्या, दरिद्रता, (धनहीनता) प्रयासों के बाद भी आक्रांत करती हो या किसी नशीले पदार्थ भाँग, अफीम, धतूरे का विष व सर्प, बिच्छू आदि का विष जीवन को तबाह कर रहा हो। मारण-मोहन अभिचार के प्रयोग अर्थात्‌ (मंत्र-यंत्र), कुल देवी-देवता, डाकिनी-शाकिनी, ग्रह, भूत-प्रेत बाधा, राक्षस-ब्रह्मराक्षस आदि से जीना दुभर हो गया हो।

चोर, लुटेरे, अग्नि, जल, शत्रु भय उत्पन्न कर रहे हों या स्त्री, पुत्र, बाँधव, राजा आदि अनीतिपूर्ण तरीकों से उसे देश या राज्य से बाहर कर दिए हों, सारा धन राज्यादि हड़प लिए हो। उसे दृढ़ निश्चय होकर विश्वासपूर्वक माँ भगवती की शरण में जाना चाहिए। स्वयं व वैदिक मंत्रों में निपुण विद्वान ब्राह्मण की सहायता से माँ भगवती देवी की आराधना तन-मन-धन से करना चाहिए।

नवरात्रि में माँ भगवती की आराधना अनेक साधकों ने बताई है। किंतु सबसे प्रामाणिक व श्रेष्ठ आधार 'दुर्गा सप्तशती' है। जिसमें सात सौ श्लोकों के द्वारा भगवती दुर्गा की अर्चना-वंदना की गई है। नवरात्रि में श्रद्धा एवं विश्वास के साथ दुर्गा सप्तशती के श्लोकों द्वारा माँ-दुर्गा देवी की पूजा, नियमित शुद्वता व पवित्रता से की या कराई जाएँ तो निश्चित रूप से माँ प्रसन्न होकर इष्ट फल प्रदान करती हैं।

इस पूजा में पवित्रता, नियम व संयम तथा ब्रह्मचर्य का विशेष महत्व है। कलश स्थापना- राहु काल, यमघंट काल में नहीं करना चाहिए। इस पूजा के समय घर व देवालय को तोरण व विविध प्रकार के मांगलिक पत्र, पुष्पों से सजा, सुन्दर सर्वतोभद्र मंडल, स्वास्तिक, नवग्रहादि, ओंकार आदि की स्थापना विधवत शास्त्रोक्त विधि से करने या कराने तथा स्थापित समस्त देवी-देवताओं का आह्वान उनके 'नाम मंत्रो' द्वारा कर षोडशोपचार पूजा करनी चाहिए जो विशेष फलदायिनी है।

ज्योति जो साक्षात्‌ शक्ति का प्रतिरूप है उसे अखंड ज्योति के रूप में शुद्ध देशी घी (गाय का घी हो तो सर्वोत्तम है) से प्रज्ज्वलित करना चाहिए। इस अखंड ज्योति को सर्वतोभद्र मंडल के अग्निकोण में स्थापित करना चाहिए। ज्योति से ही आर्थिक समृद्धि के द्वार खुलते हैं। अखंड ज्योति का विशेष महत्व है जो जीवन के हर रास्ते को सुखद व प्रकाशमय बना देती है।

नवरात्रि में व्रत का विधान भी है जिसमें पहले, अंतिम और पूरे नौ दिनों तक व्रत रखा जा सकता है। इस पर्व में सभी स्वस्थ व्यक्तियों को श्रद्धानुसार व्रत रखना चाहिए। व्रत में शुद्ध शाकाहारी व्यंजनों का ही प्रयोग करना चाहिए। सर्वसाधारण व्रती व्यक्तियों को प्याज, लहसुन आदि तामसिक व माँसाहारी पदार्थों का उपयोग नहीं करना चाहिए। व्रत में फलाहार अति उत्तम तथा श्रेष्ठ माना गया है।

नवरात्रि में अपेक्षित नियमः पवित्रता, संयम तथा ब्रह्मचर्य का विशिष्ट महत्व है। धू्म्रपान, माँस, मंदिरा, झूठ, क्रोध, लोभ से बचें। पूजन के पूर्व जौ बोने का विशेष फल होता है। पाठ करते समय बीच में बोलना या फिर बंद करना अच्छा नहीं है, ऐसा करना ही पड़े तो पाठ का आरम्भ पुनः करें। पाठ मध्यम स्वर व सुस्पष्ट, शुद्ध चित्त होकर करें। पाठ संख्या का दशांश हवनादि करने से इच्छित फल प्राप्त होता है।

दूर्वा (हरी घास) माँ को नहीं चढ़ाई जाती है। नवरात्रि में पहले, अंतिम और पूरे नौ दिनों का व्रत अपनी सामर्थ्य व क्षमता के अनुसार रखा जा सकता है।

नवरात्रि के व्रत का पारण (व्रत खोलना) दशमी में करना अच्छा माना गया है, यदि नवमी की वृद्धि हो तो पहली नवमी को उपवास करने के पश्चात्‌ दूसरे 10वें दिन पारण करने का विधान शास्त्रों में मिलता है। नौ कन्याओं का पूजन कर उन्हें श्रद्धा व सामर्थ्य अनुसार भोजन व दक्षिणा देना अत्यंत शुभ व श्रेष्ठ होता है। इस प्रकार भक्त अपनी शक्ति, धन, ऐश्वर्य व समृद्धि बढ़ाने, दुखों से छुटकारा पाने हेतु सर्वशक्ति रूपा माँ दुर्गा की पूजा-अर्चना कर जीवन को सफल बना सकते हैं।

17 March 2011

श्रीपीरखाना में वार्षिक दीवान की सभी तैयारियां पूरी

 ओढ़ां
    ओढ़ां में जलघर के निकट स्थित श्रीपीरखाना में 17 मार्च को आयोजित किए जा रहे वार्षिक दीवान की सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। श्रद्धालुओं द्वारा जगह जगह स्वागत द्वार बनाए गए है और श्रीपीरखाना के भवन को रंग बिरंगी झंडियों व बिजली की आधुनिक लडिय़ों से सजाया जा रहा है। यह जानकारी देते हुए श्रीपीरखाना के गद्दीनशीन बाबा सोहन लाल ने बताया कि गुरुवार की शाम को छह बजे विधिवत पूजा अर्चना के साथ बाबा जी के शुभ दीवान का शुभारंभ किया जाएगा और इसके साथ ही बाबाजी का अटूट लंगर शुरू कर दिया जाएगा। उन्होंने बताया कि श्रीपीरखाना के संस्थापक स्व. बाबा सरूपचंद जी की प्रतिमा श्रीपीरखाना के मध्य स्थापित की गई है और बाबाजी की प्रतिमा की स्थापना के बाद यह पहला वार्षिक दीवान आयोजित किया जा रहा है जिसमें भारी संख्या में दूर दूर से श्रद्घालु भाग लेने आ रहे हैं।

20 February 2011

जागरण में भजनों पर झूमे श्रद्धालु

ओढ़ां  न्यूज.
    पन्नीवाला मोटा के बस स्टेंड पर स्थित बैरियर के निकट निर्माणाधीन श्रीशिव हनुमान मंदिर में शनिवार को विशाल जागरण का आयोजन किया गया। इस जागरण में सिरसा से चंचल एण्ड पार्टी, गायिका चारू शर्मा, फतेहाबाद से ममता व रोशन रंगीला आदि भजन गायकों ने अपने भजनों किसने सजाया दरबार, बाबा तेरा फोटो करे कमाल, कर बाबा से प्यार पता नहीं के देदे, और श्याम बाबा आदि भजनों द्वारा उपस्थित श्रद्धालुओं को नाचने व झूमने पर विवश कर दिया। श्रद्धालु सर्दी की परवाह किए बिना पंडाल में जमे रहे और शिव बाबा का गुणगान सुनते रहे। इस दौरान कलाकारों ने अनेक सुंदर झांकियां भी निकाली जिन्हें दर्शकों ने खूब सराहा। इस अवसर पर पूर्व सरपंच श्रवण डुडी पन्नीवाला मोटा, बाबू लाल एएसआई, सरपंच बलवंत राम आनंदगढ़, बिशंभर सेठ व अनिल कुमार आनंदगढ़, सन्नी कुमार कस्वां ख्योवाली, पंडित रूपराम शास्त्री रोहिडांवाली, गुरजीत मांडा और श्रीराम सहित क्षेत्र के अनेक गणमान्य लोग व काफी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे।

छायाचित्र:  भजन गाते हुए चारू शर्मा एवं झांकी प्रस्तुत करते कलाकार।

13 February 2011

श्री गुरू रविदास जी महाराज का 635वां प्रकटोत्सव धूमधाम से मनाया

सिरसा, 12 फरवरी। संत शिरोमणि श्री गुरू रविदास सभा द्वारा हर वर्ष की तरह इस बार भी श्री गुरू रविदास जी महाराज का 635वां प्रकटोत्सव धूमधाम से मनाया जा रहा है। इस उपलक्ष्य में कार्यक्रमों का सिलसिला आज 12 फरवरी से शुरू हो गया। आज सुबह बाजारों में प्रभात फेरी निकाली गई। सभा के महासचिव मुरलीधर कटारिया ने बताया कि कल 13 फरवरी को रानियां रोड स्थित मंदिर परिसर में सुबह 9 बजे विशाल रक्तदान शिविर का आयोजन किया जाएगा। शिविर का शुभारंभ प्रदेश कांग्रेस के संगठन सचिव नवीन केडिया करेंगे। आगामी 17 फरवरी को भव्य शोभायात्रा निकाली जाएगी जो मंदिर से शुरू होकर विभिन्न बाजारों से होती हुई शाम को वापस मंदिर में पहुंचेगी। इस शोभायात्रा को हरियाणा प्रदेश कांग्रेस के प्रतिनिधि गोविंद कांडा झंडी दिखाकर रवाना करेंगे। शोभायात्रा का समय दोपहर 12 बजे का रहेगा। रविदास जयंती 18 फरवरी के दिन मंदिर में मुख्य समारोह का आयोजन किया जाएगा जिसमें सिरसा के सांसद डॉ. अशोक तंवर मुख्यातिथि होंगे। कार्यक्रम की अध्यक्षता अतिरिक्त उपायुक्त पंकज चौधरी करेंगी। इसी दिन समारोह के उपरांत मंदिर परिसर में लंगर भंडारे का आयोजन भी किया जाएगा। सभा के महासचिव मुरलीधर कटारिया ने आह्वान किया है कि अधिक से अधिक संख्या में इस कार्यक्रम में भाग ले।

धूमधाम के साथ मनाया गया 15 वां मूर्ति स्थापना दिवस

  ओढ़ां न्यूज.
    ओढ़ां में जीटी रोड पर स्थित श्रीहनुमान मंदिर में 15 वां मूर्ति स्थापना दिवस धूमधाम के साथ मनाया गया। इस अवसर पर श्रीहनुमानजी की मूर्ति को दूध, दही, घी, शहद व गंगाजल से स्नान करवाया गया तथा आचार्य सीताराम सहित पंडित पवन कुमार, पिरथी राज व राकेश कुमार आदि ने मंत्रोच्चारण के साथ हवन यज्ञ का आयोजन किया गया तथा श्री रामायण पाठ का भोग डाला गया। इस अवसर पर श्री हनुमत सेवा समिति के प्रधान जोतराम, कोषाध्यक्ष राजेंद्र गोदारा, बिटू कुंडर, विनोद गोयल और नरेंद्र सिंह पैट्रोल पंप वाले सहित श्री हनुमत सेवा समिति के सभी सदस्य व काफी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे।

11 February 2011

बाबा रामदेव जी महाराज का मेला 12 व 13 फरवरी को

सिरसा
                भादरा पार्क के निकट प्राचीण श्री रामदेव जी मंदिर में बाबा रामदेव जी महाराज का मेला 12 व 13 फरवरी को श्रद्धा व उल्लास के साथ लगाया जाएगा। यह जानकारी देते हुए मंदिर के सेवादार मुकंदलाल ने बताया कि इस मेले के दौरान बाबा जी का विशाल सत्संग व भंडारे का आयोजन किया जाएगा। उन्होंने बताया कि इस मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं की बाबा रामदेव की कृपा से सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं। उन्होंने आमजन से अनुरोध किया है कि इस धार्मिक कार्यक्रम में शामिल होकर बाबा जी का आशीर्वाद प्राप्त करें।

10 February 2011

15 वां मूर्ति स्थापना दिवस आज



    ओढ़ां में जीटी रोड पर स्थित श्रीहनुमान मंदिर में 11 फरवरी को 15 वां मूर्ति स्थापना दिवस धूमधाम के साथ मनाया जाएगा। यह जानकारी देते हुए श्री हनुमत सेवा समिति के प्रधान जोतराम ने बताया कि 11 फरवरी को सुबह श्रीहनुमान जी की मूर्ति को दूध, दही, शहद, गंगाजल आदि से नहलाया जाएगा और हवन यज्ञ का आयोजन किया जाएगा। तदुपरांत इस अवसर पर आयोजित श्रीराम कथा का समापन किया जाएगा तथा रात्रि को बालाजी के जागरण का आयोजन किया जाएगा। जागरण में फतेहाबाद से आई भजन पार्टी बालाजी का गुणगान करेगी।


छठा विशाल जागरण 12 फरवरी को

    खंड के गांव ख्योवाली में स्थित श्रीठाकुरजी मंदिर में 12 फरवरी को मूर्ति स्थापना दिवस के अवसर छठे विशाल जागरण का आयोजन किया जाएगा। यह जानकारी देते हुए मंदिर के पुजारी बलवीर शर्मा ने बताया कि जागरण में ऐलनाबाद से आमंत्रित श्रीकृष्ण स्वामी भजन मंडली ठाकुरजी का गुणगान करेगी तथा 13 फरवरी की सुबह हवन यज्ञ व भंडारे का आयोजन किया जाएगा जिसमें समस्त गांववासी भाग लेंगे।

31 January 2011

रामलीला मैदान में स्पैशल नामचर्चा का आयोजन

सिरसा।  डेरा सच्चा सौदा की दूसरी पातशाही परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज के पावन जन्ममाह के उपलक्ष्य में सिरसा ब्लाक की साध संगत द्वारा बीती सायं स्थानीय नेहरू पार्क स्थित रामलीला मैदान में स्पैशल नामचर्चा का आयोजन किया गया। नामचर्चा कार्यक्रम में हजारों की तादाद में डेरा प्रेमियों ने शिरकत की तथा सतगुरू की महिमा गाई। इस अवसर पर नामचर्चा स्थल को भव्य ढंग से सजाया गया था।  नामचर्चा के दौरान कविराज भाइयों ने मधुर वाणी में भजन सुनाए, जिन पर साध संगत मंत्रमुग्ध होकर झूम उठी।
नेहरू पार्क के रामलीला मैदान में आयोजित ब्लाक स्तरीय स्पैशल नामचर्चा में कविराज भाइयों ने 'मुबारकां, मुबारकां, मुबारकां जन्म दिहाड़े दिया मुबारका, 'सारे जग में होगा एक ही नाम शाह सतनाम, शाह सतनाम, 'यां जगमग जगमग क्यूं हो री सै, ईस बात का तनै के बैरा सै, कलियुग में अवतार धार के आया सतगुरू मेरा सै, 'असी नचना सतगुरू जी तेरी बांह फड के इत्यादि भजन सुनाए, जिन पर साध संगत खूब झूमी। मंच संचालन ब्लाक भंगीदास कस्तूर इन्सां ने किया। इस अवसर पर पंद्रह मैम्बर मनोहर लाल इन्सां ने साध संगत के सामने वे ट्राफियां व प्रेम निशानियां प्रस्तुत की, जो सेवा कार्यों में अग्रणी रहने के लिए पूज्य संत गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां ने ब्लाक के सेवादारों को प्रदान की थी। मनोहर लाल ने साध संगत को सराहनीय सेवा कार्यों के लिए बधाई दी तथा आह्वान किया कि वे और अधिक बढ चढकर परमार्थी कार्य करें। इस मौके पर रामा चैरिटेबल ट्रस्ट के पदाधिकारियों गुलशन गाबा, औमप्रकाश लूना, बिट्टू अनेजा, विजय ऐलाबादी, श्याम बजाज ने भी शिरकत की तथा डेरा सच्चा सौदा द्वारा किए जा रहे मानवता भलाई कार्यों की सराहना की तथा ट्रस्ट की ओर से ब्लाक को हर संभव सहायता देने की बात कही। इस मौके पर पंद्रह मैम्बर सुरेंद्र इन्सां, सात मैम्बर जीत इन्सां, सतीश इन्सां, अमरजीत इन्सां, राजकुमार इन्सां सहित गांवों के भंगीदास,जिम्मेवार भाई बहन व साध संगत उपस्थित थी। नामचर्चा के समापन अवसर पर प्रसाद भी वितरित किया गया।

फोटो:- नामचर्चा में उपस्थित साध संगत।

ब्राह्मण सभा सिरसा की बैठक आयोजित

सिरसा, 30 जनवरी
श्री ब्राह्मण सभा सिरसा की एक बैठक स्थानीय गीता भवन में आयोजित की गई। बैठक में मुकेश भारद्वाज की माता प्रभा देवी तथा ओमप्रकाश मिश्र की पत्नी भगवती देवी के निधन पर शोक प्रस्ताव पारित किए गए। बैठक की अध्यक्षता करते हुए सभा के प्रधान आरपी शर्मा ने दिवंगत आत्माओं के प्रति दो मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि दी। शोक सभा में बृजमोहन शर्मा, प्रमोद मोहन गौतम, सतीश निर्मल, हरिओम भारद्वाज, बजरंग पारीक, अर्जुन शर्मा, एसएन पारीक, मदन मोहन पारीक, वेद चाड़ीवाल, योगेश शर्मा, शमशेर शर्मा सहित समाज के गणमान्य लोग उपस्थित थे।

29 January 2011

नेहरू पार्क में स्पेशल नामचर्चा कल


सिरसा। कल 30 जनवरी को सिरसा ब्लाक की साध संगत द्वारा स्थानीय नेहरू पार्क स्थित रामलीला ग्राउंड में स्पैशल नामचर्चा का आयोजन किया जाएगा। यह जानकारी देते हुए ब्लाक भंगीदास कस्तुर इन्सां ने बताया कि परम पिता शाह सतनाम जी महाराज के पावन जन्मदिन के उपलक्ष्य में सरसा ब्लाक की साध संगत द्वारा 30 जनवरी को सायं 4 बजे से 6 बजे तक स्पैशल नामचर्चा का आयोजन किया जाएगा। उन्होने बताया कि नामचर्चा को लेकर साध संगत द्वारा तैयारियां की जा रही है। नामचर्चा स्थल को भव्य ढंग से सजाया जा रहा है। दर्जनो सेवादार सजावटी कार्य तथा अन्य व्यवस्थाएं बनाने में जुटे हुए है। कस्तुर इन्सां ने बताया कि नामचर्चा कार्यक्रम में कविराज भाइयों द्वारा मधुर वाणी में सतगुरू की महिमा का गुणगान किया जाएगा । कस्तुर इन्सां ने साध संगत से आह्वान किया कि इस पावन अवसर पर अधिक से अधिक संख्या में पहुंचकर शाह सतनाम जी महाराज के पावन जन्ममाह की खुशियां मनाए।

25 January 2011

ईद-ए-मिलादून नबी जलसा के मौके पर मुसलमान भाईयों को मुबारकबाद दी

सिरसा
         प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रतिनिधि पं. होशियारी लाल शर्मा ने गत् रात्रि सुभाष चौक पर स्थित जामा मस्जिद में बंगाली मुजद दीदीया कमेटी की ओर से आयोजित ईद-ए-मिलादून नबी जलसा के मौके पर पहुंचकर मुसलमान भाईयों को मुबारकबाद दी। इस मौके पर श्री शर्मा ने लोगों से आपसी भाईचारा कायम करने की अपील करते हुए कहा कि मुल्क की एकता व शांति के लिए हमें मिलकर काम करना चाहिए। इससे पहले जलसे में पहुंचने पर श्री शर्मा का शाल ओढ़ाकर स्वागत किया गया। श्री शर्मा के साथ कांग्रेस ब्लाक शहरी प्रधान भूपेश मेहता, हरीश सोनी, भोला जैन, संत लाल गुंबर, सुभाष सोनी भी पहुंचे। जलसे की शुरूआत जामा मस्जिद के ईमाम मो. हनीफ कुरैशी ने ब्यान के साथ की। इसके बाद शेखुल हदीम आलीसा यूनीवर्सिटी कलकत्ता से पहुंचे हजरत मौलान मुफ ती अलहाज महमुदूर रहमान साहब कासमी (फारीमुत तहसील दारूल उलूम देवबंद) ने उलेमाए किराम पढ़ा। उनके अलावा खतीबे असर हजरत मौलाना निजामुद्दीन साहब और हजरत मौलाना मो. अब्बास सिद्दीकी (फुरफुरा शरीफ) ने भी किराम पढ़े। इस मौके पर हरियाणा मुस्लिम खिदमत सभा के प्रदेश उपाध्यक्ष हजी युसूफ खान मलिक, मुख्य नियंत्रक ताज मोहम्मद मिर्जा, जाफर खान मलिक, मेघा खान बंगाली, अनारूल, मुर्शफ, नूर मोहम्मद, नासीर मुल्ला, समीर, गुलजार, रशीद, ईस्लाम बंगाली व अन्य मुसलमान मौजूद थे।

शाह सतनाम जी महाराज के पावन जन्मभंडारे पर उमड़ा श्रद्धा का सैलाब

सिरसा
                               सम्मानित हुए मानवता के सच्चे सेवादार
वर्ष 2010 में डेरा सच्चा सौदा की साध संगत ने मानवता की सेवा में खर्च की100 करोड़ से अधिक की राशि 
           डेरा सच्चा सौदा की दूसरी पातशाही परमपिता शाह सतनाम जी महाराज के पावन जन्मदिवस के उपलक्ष्य में विशाल भंडारे का आयोजन किया गया। इस अवसर पर देश विदेश से सवा करोड़ से अधिक लोगों ने शिरकत की तथा पूज्य संत गुरमीत राम रहीम ङ्क्षसह जी के पावन वचनों को श्रवण किया। भंडारे के पावन अवसर पर वेश्यावृति त्याग कर समाज की मुख्यधारा में शामिल हुई 'शुभदेवीÓ की 'भक्तयोद्धाÓ से शादी करवाई गई। इसके साथ ही आदिवासी इलाकों में रहने वाले 150 से अधिक जोड़े भी पूज्य गुरू जी की पावन उपस्थिति में विवाह बंधन में बंधे। इन नवविवाहित जोड़ों को डेरा सच्चा सौदा के शाही परिवार के सदस्यों की ओर से घरेलू उपयोग का सामान तथा कपड़े इत्यादि भेंट किए गए। इस अवसर पर पूज्य गुरू जी ने डेरा सच्चा सौदा द्वारा मानवता भलाई के लिए किए जा रहे 60 से अधिक कार्यों में लगे ब्लाकों के सेवादारों, होनहार खिलाडिय़ों व विद्यार्थियों को स्मृति चिन्ह व मैडल देकर सम्मानित किए।
शाह सतनाम जी महाराज के पावन भंडारे के अवसर पर आयोजित सत्संग के अवसर पर सत्संग पंडाल व स्टेज को भव्य ढंग से सजाया गया था। पूज्य गुरू जी के स्टेज पर पहुंचते ही पंडाल में उपस्थित साध संगत ने 'धन धन सतगुरू तेरा ही आसराÓ का नारा लगाकर उन्हे पावन जन्मदिवस की बधाई दी। पूज्य गुरू जी ने उन्हे अपने पावन आशीर्वाद से नवाजा।
पंडाल में उपस्थित अथाह जनसमूह को देखकर लग रहा था, मानो श्रद्धा रूपी समुंद्र हिलौरे ले रहा हो। श्रद्धालुओं ने नाच नाच कर अपने अंदाज में खुशियां मनाई। पूज्य गुरू जी के पावन कर कमलों से सम्मानित होने वाले ब्लाकों के सेवादारों की खुशियां छुपाए नही छुप रही थी।
इस अवसर पर साध संगत को संबोधित करते हुए पूज्य संत गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां ने कहा कि एक मुरीद, शिष्य, मुर्शिद के लिए अपने सतगुरू का जन्मदिन अनमोल होता है, बड़े त्यौहार की तरह होता है। इस दिन मुरीद को चाहिए कि वो अपनी बुराइयों को त्यागने का संकल्प करेंं तथा प्रण ले कि वो अधिक से अधिक मानवता भलाई कार्य करेगा। पूज्य गुरू जी ने बताया कि बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज द्वारा रोपित किए गए डेरा सच्चा सौदा रूपी पौधे को परम पिता शाह सतनाम जी महाराज ने बखूबी सजाया संवारा तथा इसे उपवन, बगीचे में तबदील कर दिया। वर्तमान में उन्ही की दया, मेहर, रहमत से डेरा सच्चा सौदा रूहानियत, मानवता भलाई कार्यों में पूरे विश्व को अपनी खुश्बू से महका रहा है अपनी छाया से सबको निहाल कर रहा है। पूज्य गुरू जी ने कहा कि शाह मस्ताना जी महाराज, परम पिता शाह सतनाम जी महाराज द्वारा फरमाए गए वचन ज्यों के त्यों अक्षरश सत्य हो रहे है। डेरा सच्चा सौदा दिन दोगुणी रात चौगुणी उन्नति कर रहा है। डेरा सच्चा सौदा रूपी रूहानी कालेज से जुड़ कर आज विश्वभर के करोड़ों लोग बुराइयों से तौबा कर एक स्वस्थ समाज की संरचना में लगे हुए है। पूज्य संत जी ने कहा कि कलयुग के भयानक समय में काल का जोर है तथा आज चारों तरफ बुराई का बोलबाला है परंतु इस समय में दयाल की दया, मेहर , रहमत की कई गुणा बढ़ चढ़कर बरस रही है। जिस कारण सच्चाई, अच्छाई के मार्ग पर चलने वालों की संख्या भी दिन रात कई गुणा बढ़ती जा रही है। अगर बुराई के नुमायंदेबढ़ रहे है तो राम नाम पर चलने वालों की भी कोई कमी नही है। उन्होने कहा कि सत्संग में वो ही जीव आते है, जिन पर परमात्मा, अल्लाह, सतगुरू की दया, मेहर होती है। पूज्य गुरू जी ने भंडारे के अवसर पर पधारने वाली संगत को मानवता भलाई कार्यों में बढ़ते रहने का आह्वान करते हुए कहा कि सच्चा इंसान वहीं है जो दूसरों के दुख- मुसीबत में काम आता है। बुराई के दलदल में फंसे लोगों को निकालता है तथा राम नाम का सुमिरन करते हुए नेकी भलाई के पथ पर चलता रहता है।

पूज्य गुरू जी के हाथों सम्मान पाकर फुले नही समाएं सेवादार:-
 पावन भंडारे के अवसर पर आयोजित सत्संग कार्यक्रम के दौरान पूज्य गुरू जी ने पौधारोपण, रक्तदान, मानवता भलाई कार्यों में अग्रणी रहने वाले ब्लाकों के सेवादारों को मैडल देकर सम्मानित किया। पूरे भारत में हरियाणा राज्य की साध संगत ने मानवता भलाई कार्यों पर 19 करोड़ 73 लाख 54042 रूपए खर्च किए तथा प्रथम स्थान पर रहे। दूसरे स्थान पर पंजाब राज्य की साध संगत रही, पंजाब ने 19 करोड़ 17 लाख 72014 रूपए खर्च किए। विदेशों में मानवता भलाई कार्यों में कनाडा ब्लाक प्रथम रहा, यहां की साध संगत ने 44 लाख 24 हजार 655 रूपए खर्चे। दूसरे स्थान पर यूएसए की साध संगत रही, उसने 42 लाख 33472 रूपए खर्च किए। हरियाणा में सिरसा ब्लाक प्रथम स्थान पर रहा, सिरसा ने मानवता भलाई कार्यों पर 2 करोड़ 12 लाख 9571 रूपए खर्च किए। दूसरे स्थान पर कैथल रहा, यहां की साध संगत ने 1 करोड़ 43 लाख 7800 रूपए खर्चे। पंजाब राज्य में संगरूर ब्लाक प्रथम स्थान पर रहा, यहां की साध संगत ने 1 करोड़ 62 लाख 59379 रूपए खर्च किए। दूसरे स्थान पर बठिंडा ब्लाक रहा, यहां की संगत ने 1 करोड़ 54 लाख 25725 रूपए खर्च किए। राजस्थान में श्रीगंगानगर ब्लाक पहले स्थान पर रहा, यहां की साध संगत ने 57 लाख 77 हजार 335 रूपए खर्चे। राजस्थान ने वर्ष 2010 में 10 करोड़ 95 लाख रूपए मानवता की सेवा में लगाए। दिल्ली प्रदेश में जहांगीरपुरी ब्लाक पहले स्थान पर रहा इसने 78 लाख 53 हजार 146 रूपए खर्चे। दूसरे स्थान पर बदरपुर ब्लाक रहा, इसने 57 लाख 37 हजार 603 रूपए मानवता की सेवा में लगाए। दिल्ली ने वर्षभर में कुल 4 करोड़ 43 लाख 24 हजार 722 रूपए मानवता की सेवा में लगाए। हिमाचल प्रदेश का नाहन ब्लाक मानवता भलाई कार्यों में 5 लाख 67 हजार 713 रूपए खर्च कर पहले स्थान पर रहा जबकि दूसरे स्थान पर ढांडा सिवा ब्लाक रहा, यहां की साध संगत ने 3 लाख 31 हजार 940 रूपए खर्च किए। उत्तरप्रदेश की साध संगत ने वर्ष 2010 में 4 करोड़ 49 लाख 74 हजार 5 रूपए मानवता की सेवा में अर्पित किए।
इसके अलावा शाह सतनाम जी शिक्षण संस्थान के बच्चों ने अपनी पाकेट मनी से वर्ष 2010 में 2 करोड़ 37 लाख 81 हजार 725 रूपए मानवता भलाई कार्यों पर खर्च कर एक मिसाल कायम की। पूज्य गुरू जी की पावन प्रेरणा पर अमल करते हुए डेरा सच्चा सौदा की साध संगत ने वर्ष 2010 में देश के विभिन्न राज्यों व विदेशों की साध संगत द्वारा लिखित में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक 100 करोड़ से अधिक की राशि मानवता की सेवा में खर्च की। डेरा सच्चा सौदा के सतब्रहमचारी सेवादारों द्वारा 2 करोड़ 59 लाख 58 हजार 505 रूपए मानवता की सेवा में खर्च किए। पूज्य गुरू जी ने मानवता के इन सच्चे सेवादारों को मैडल व स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया। इसके साथ ही पूज्य गुरू जी ने खेलों व शिक्षा के क्षेत्र में डेरा सच्चा सौदा का परचम विश्वभर में फहराने वाले शाह सतनाम जी शिक्षण संस्थान के होनहार खिलाडिय़ों व विद्यार्थियों को शुद्ध सोने, चांदी व हीरों  के मैडल, टै्रक सूट देकर सम्मानित किया।

24 January 2011

शाह सतनाम जी महाराज के पावन जन्म दिवस 25 जनवरी पर विशेष

 सिरसा  
            डेरा सच्चा सौदा के दूसरे गुरु परम पिता शाह सतनाम जी महाराज का जन्म  25 जनवरी 1919 को हरियाणा के सरसा  जिले के गांव श्री जलालआणा साहिब में हुआ। आप जी के आदरणीय पिता जी का नाम श्री वरियाम सिंह जी तथा माता जी का नाम पूज्य माता आसकौर जी था।  आप जी का बचपन का नाम श्री हरबंस सिंह जी था। लेकिन आप जी जब बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज (डेरा सच्चा सौदा के संस्थापक) के पास डेरा सच्चा सौदा में आए तो मस्ताना जी महाराज ने आप जी का  नाम बदल कर शाह सतनाम जी रख दिया और आप जी के बारे वचन किए कि च्ये वोही सतनाम है जिसे मुद्दतों से दुनिया जपती है। देखा है कभी किसी ने ? जो इनके दर्शन कर लेगा वो भी नर्को में नहीं जाएगा सतनाम  कुल मालिक का नाम है। पूज्य पिता श्री वरियाम सिंह का बहुत ऊंचा घराना, बहुत बड़ा जमींदारा और घर में बेशुमार धन-सम्पत्ति थी, परंतु चिंता थी तो केवल संतान की।
    एक बार गाँव में एक फकीर का आगमन हुआ। पूज्य माता-पिता जी ने कई दिनों तक उस फकीर की दिल से सेवा की जिससे उस फकीर ने खुश होकर कहा-भगतो आपकी सच्ची-सेवा से हम बहुत खुश हैं। आप की सेवा भगवान को मंजूर है। वह आपकी संतान प्राप्ति की सच्ची हार्दिक, कामना को अवश्य पूरी करेगा। आपके घर कोई महापुरुष जन्म लेगा। इस तरह उस सच्चे फकीर की दुआ से पूज्य माता-पिता की 18 वर्ष की  प्रबल तड़प उस समय पूरी हुई जब पूज्य परम पिता जी ने 25 जनवरी 1919 को उनके यहां अवतार लिया।
    पूज्य परम पिता जी बचपन से ही दयालुता के समुद्र थे। आप जी शुरू से ही घरेलू कार्यों की बजाए परमार्थी कार्यों में अधिक रूचि लेते थे और हर सम्भव लोगों का भला करते थे। परम पूजनीय परम पिता जी जब से शहनशाह मस्ताना जी महाराज की पावन-दृष्टि में आए, पहले दिन से ही शहनशाह मस्ताना जी महाराज ने आप जी को उन्हे अपना भावी उत्तराधिकारी मान लिया था और उसी दिन से ही आप जी को अपने रूहानी नजरिए से डेरा सच्चा सौदा के दूसरे पातशाह के रूप में देखना आरंभ कर दिया था। दूनियावी नजर में पूज्य मस्ताना जी महाराज ने परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज को दिनांक 28 फरवरी 1960 को पूरे सिरसा शहर में एक बहुत ही प्रभावशाली शोभा यात्रा के द्वारा जीप में घुमाया। ताकि कुल दुनिया को पता चल जाए कि  बेपरवाह मस्ताना जी महाराज ने शाह सतनाम सिंह जी को डेरा सच्चा सौदा में अपना स्वरूप बख्श कर अपना उत्तराधिकारी  बना दिया है।
    पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज ने 30 वर्ष तक साध-संगत व इस पावन दरबार को अपने रहमो-कर्म के अमृत से बड़े ही प्रेम-प्यार से सींचा।
    23 सितंबर 1990 को परमपिता शाह सतनाम जी महाराज ने डेरा सच्चा सौदा की बागडोर हजूर महाराज संत गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां को सौंपी और लगभग डेढ़ वर्ष तक साथ रहे। परमपिता जी ने अपने रूहानी कार्यक्रमों में 28 फरवरी 1960 से लेकर 23 सितंबर 1990 तक 12 लाख से अधिक लोगों को बुराईयों से दूर कर ध्यान मार्ग की युक्ति सिखाकर उनका उद्धार किया। आज उनकी पावन शिक्षाओं के अनुसार पूजनीय हजूर पिता संत गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां की प्रेरणा से 2.5 करोड़ से अधिक लोग नशे इत्यादि बुराईयां छोड़कर सदकर्में के मार्ग पर चल रहे हैं। इसके साथ वर्तमान में पूज्य गुरू जी ने कन्या भ्रूणहत्या, वेश्यावृति उन्मूलन तथा किन्नरों के उत्थान के लिए भी अभियान चलाया हुआ हैं,  इस अभियान के तहत पूज्य गुरू जी के आह्वान पर करीब डेढ हजार युवा आगे आए हैं, जो वेश्यावृति के दलदल को त्यागकर समाज की मुख्यधारा में शामिल होने वाली महिलाओं को अपना जीवन साथी बनाने के लिए तैयार हैं इसके अलावा सैंकड़ों परिवार उन लड़कियों को अपनी बेटी-बहन के रूप में अपनाने को तैयार हुए है। इसके साथ ही पूज्य गुरू जी ने सदियों से उपेक्षित किन्नर समुदाय की सुध लेते हुए किन्नर बालकों की शिक्षा की व्यवस्था की हैं।
    परम पिता शाह सतनाम जी महाराज का पावन जन्म भण्डारा 25 जनवरी शाम को डेरा सच्चा सौदा में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता हे। देश-विदेश से लाखों की तादाद में श्रद्धालु इस आयोजन में शिरकत करते है। इस दौरान पूजनीय गुरू संत गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां मानवता भलाई के कार्यों, शिक्षा व खेलों में अव्वल रहने वाले सज्जनों को सम्मानित भी करते है।
                                आनंद भार्गव
                                सिरसा- 94161-11511

भंडारे की सभी तैयारियां पूर्ण

सिरसा
        डेरा सच्चा सौदा में परम पिता शाह सतनाम जी महाराज के पावन जन्मदिवस के उपलक्ष्य में आयोजित होने वाले भंडारे की सभी तैयारियां पूर्ण कर ली गई है। भंडारे में देश- विदेश से आने वाली साध संगत के रहने, ठहरने, वाहनों की पार्किंग, यातायात निंयत्रण  के लिए बेहतरीन इंतजाम किए गए है। इस बारे में विस्तृत जानकारी देते हुए डेरा सच्चा सौदा के प्रवक्ता डा. पवन इन्सां ने बताया कि भंडारे के लिए 1 लाख से अधिक सेवादारों की डयूटियां लगाई गई है। इसके साथ ही डेरा में मुख्य सत्संग पंडाल के अलावा 15 ग्रांउड बनाए गए है, जहां साध संगत बैठकर पूज्य गुरू जी के वचनों को श्रवण कर सकती है तथा उनके दर्शन कर सकती है। सत्संग के लिए 150 बड़ी स्क्रीने तथा 700 रंगीन टीवी  सैटस के माध्यम से सत्संग का लाईव प्रसारण किया जाएगा। इसके साथ ही इंटरनेट तथा सिटी केबल के माध्यम से सत्संग का लाईव प्रसारण किया जाएगा। डा. इन्सां ने बताया कि वाहनों के लिए 10 विशाल ट्रेफिक ग्रांउड बनाए गए है जिनमें राज्यों वाईज वाहन खड़े करने की व्यवस्था की गई है। डेरा प्रवक्ता ने बताया कि सत्संग में वाहनों की व्यवस्था बनाए रखने के लिए सड़कों पर सेवादारों की डयूटियां लगाई गई है। इसके अलावा दमकल गाड़ी, के्रन, मोबाइल अस्पताल फरिश्ता, एंबुलैंस गाडिय़ां तैनात की गई है। डेरा प्रवक्ता ने बताया कि 25 प्राथमिक चिकित्सा केंद्र स्थापित किए गए है। इसके अलावा बिजली समिति, लंगर समिति, पानी समिति, सांउड समिति, यातायात समिति के माध्यम से सेवादारों की डयूटियां लगाई गई है। उन्होने बताया कि सिरसा शहर से लेकर शाह सतनाम जी धाम तक भव्य सजावट की गई है। बड़े बड़े स्वागती द्वार, रंग बिंरगी झंडिया, विद्युत चलित लडियां और रंग बिरंगे झंडे लगाए गए है, जो मनमोहक नजारा प्रस्ततु करते है। डेरा प्रवक्ता ने बताया कि भंडारे के पावन अवसर पर पूज्य संत गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां 25 जनवरी तथा 26 जनवरी को सत्संग कार्यक्रम को सबोंधित करेंगे तथा नए जीवों को गुरूमंत्र, रामनाम की अनमोल दात प्रदान करेंगे।
 

23 January 2011

शाह सतनाम जी ग्रीन एस वेलफेयर फोर्स विंग के सेवादार दूसरों की मदद के लिए हर समय तैयार रहते है

सिरसा।
           मानवता भलाई कार्यों में यूं ही आगे बढ़ते रहों। जो दूसरों का भला करते है,ईश्वर, अल्लाह, राम उनका भला कई गुणा बढ़ चढ़कर करता है। आज कलयुग में लोग दूसरों का बुरा करने में लगे रहते है वहीं दूसरी तरफ शाह सतनाम जी ग्रीन एस वेलफेयर फोर्स विंग के हजारों सेवादार दूसरों की मदद के लिए हर समय तैयार रहते है। यह मालिक की रहमत ही है। उक्त उदगार संत गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां ने शनिवार देर सायं डेरा सच्चा सौदा में शाह सतनाम जी ग्रीन एस वेलफेयर फोर्स विंग के स्थापना दिवस पर आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहे। कार्यक्रम का शुभारंभ पूज्य गुरू जी ने ग्रीन एस का ध्वजारोहण करके किया। इस अवसर पर शाह सतनाम जी ग्रीन एस वेलफेयर फोर्स विंग के हजारों सेवादार भाई बहन उपस्थित थे। कार्यक्रम के आरंभ में ग्रीन एस के सेवादारों ने मार्च पास्ट किया। इसके पश्चात रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम तथा विंग द्वारा किए जा रहे मानवता भलाई कार्यों पर आधारित झांकियां निकाली गई। इस अवसर पर पूज्य गुरू जी ने बताया कि शाह सतनाम जी ग्रीन एस वेलफेयर फोर्स विंग अपने उद्देश्य पर खरा उतर रही है। यह एक ऐसी फोर्स है जो हर आपदा में फंसे हुए लोगों की मदद के लिए हर समय तैयार रहती है तथा अपने प्राणों पर खेलकर दूसरों की जान को बचाती है। प्राकृतिक आपदा, आगजनी, सड़क दुर्घटना, बेघरों को मकान बनाकर देना, रक्तदान, पौधारोपण ,नशा मुक्ति सहित अनेक मानवता भलाई कार्यों में शाह सतनाम जी ग्रीन एस वेलफेयर फोर्स के सेवादार हर समय दूसरों की मदद के लिए तैयार रहते है। पूज्य गुरू जी ने बताया कि वर्ष 2001 में गठित की गई शाह सतनाम जी ग्रीन एस वेलफेयर फोर्स विंग के सेवादारों की संख्या 35000 के करीब पहुंच चुकी है। पूज्य गुरू जी ने बताया कि रक्तदान, पौधारोपण के क्षेत्र में किए गए बेमिसाल कार्यों की बदौलत शाह सतनाम जी ग्रीन एस वेलफेयर फोर्स विंग का नाम अनेक बार गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड में शामिल हो चुका है। पूज्य गुरू जी ने ग्रीन एस के सेवादारों को मानवता भलाई कार्यों में अग्रणी बने रहने का आह्वान करते हुए उन्हे अपने पावन आशीर्वाद से नवाजा। इस अवसर पर पूज्य गुरू जी ने अपनी मधुर वाणी में शबद भजन भी सुनाया, जिस पर साध संगत मंत्र मुग्ध होकर झूमने लगी।

बबलू शर्मा लेंगे जैन दीक्षा

सिरसा,
                                    भाई के नक्शे कदम पर चलते भाई ने त्यागा संसारिक जीवन
बबलू शर्मा
              संत शिरोमणि स्वामी फूल चंद जी महाराज के शिष्य श्री सुमति मुनि जी, श्री सत्य प्रकाश मुनि व श्री समर्थ मुनि के सानिध्य में अध्ययनरत वैरागी बबलू शर्मा संसारिक जीवन से परित्याग करके 30 जनवरी रविवार को धार्मिक नगरी सिरसा में जैन दीक्षा ग्रहण कर रहे है।
    एस.एस. जैन सभा सिरसा के प्रधान प्रेमी नाहटा व युवक मंडल के प्रधान शिव जैन ने बताया कि बबलू शर्मा 25 अप्रेल 2010 को स्वामी फूल चंद जी की ९ वीं पुण्यतिथि पर जैन संतो के सम्पर्क में आये और जैन धर्म में लगन लग गई तभी से संतो के साथ ही वैरागी बन रह रहे है। बबलू शर्मा का जन्म भिवानी में 15 सिंतबर 1992 में हुआ। दसंवी तक शिक्षित बबलू ने अपने गुरूओं से जैन धर्म के अनेक ग्रंथो, प्रतिक्रमण, 25 बोल, मेरी भावना, 12 भावना, आज्ञम अध्ययनरत आदि का ज्ञान का प्राप्त किया।
    बबलू शर्मा के तीन भाई है जिनमें एक भाई ने पहले ही जैन दीक्षा गृहण की हुई है जो समर्थ मुनि के रूप में जाने जाते है व अन्य दो भाई भिवानी में ही रहते है। बबलू शर्मा के पिता का स्वर्गवास हो चुका है। बबलू शर्मा की माता कृष्णा देवी भिवानी जिले के मानहेरू के सरकारी अस्पताल में स्टाफ नर्स के पद पर कार्यरत है। उन्होंनें बताया कि वैरागी बबलू ब्राह्मण परिवार से संबध रखते है और उन्हें बचपन से ही पढ़ाई के साथ-साथ अपने आपको भक्ति में लगाया व जैन धर्म में रूचि रखने लगा। उन्होंने बताया कि किसी ज्योतिषि ने पहले ही भविष्यवाणी कर दी थी कि बबलू के परिवार से दो संत बनेगें। प्रधान ने बताया बबलू शर्मा की 29 जनवरी को मेंहदी रस्म अदा की जाएगी व 30 जनवरी को वे जैन दीक्षा लेंगे। इस अवसर पर सुन्दर झांकिया भी निकाली जाएगीं। उन्होंने बताया कि इस अवसर पर पंजाब, राजस्थान सहित अनेक प्रांतो से श्रावक व श्रद्धालु जैन दीक्षार्थी को शुभाशीष प्रदान करेगें।

21 January 2011

पूजनीय शाह सतनाम सिंह जी महाराज के पावन जन्ममाह के उपलक्ष्य में 25 जनवरी को आयोजित होने वाले विशाल भंडारे व सत्संग कार्यक्रम की तैयारियां जोरो शोरों से जारी

सिरसा।
        डेरा सच्चा सौदा के पूजनीय शाह सतनाम सिंह जी महाराज के पावन जन्ममाह के उपलक्ष्य में 25 जनवरी को आयोजित होने वाले विशाल भंडारे व सत्संग कार्यक्रम की तैयारियां जोरो शोरों से जारी है। डेरा सच्चा सौदा को भव्य ढंग से सजाया जा रहा है। विद्युत चलित लडिय़ां, बड़े बड़े स्वागती द्वार, रंग बिरंगे झंडे लगाए गए है तथा डेरा सच्चा सौदा के भवनों को पिस्ता रंग(हल्का हरा)में रंग दिया गया है। इस कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए अभी से श्रद्धालुओं का तांता लग गया है। वहीं डेरा सच्चा सौदा में रोजाना सुबह शाम आयोजित होने वाले मजलिस कार्यक्रम में पूज्य संत गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां सेवा कार्य करने वाले सेवादारों को अपने पावन कर कमलों के द्वारा अनमोल प्रेम निशानी(अनमोल दातें) प्रदान कर रहे है। रोजाना हजारों की संख्या में सेवादार भाई बहने पूज्य गुरू जी से अनमोल निशानी पाकर फूले नही समा रहे है तथा अपने सतगुरू का कोटि कोटि धन्यवाद कर रहे है।
डेरा सच्चा सौदा की दूसरी पातशाही परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज के पावन जन्ममाह के उपलक्ष्य में 25 जनवरी को आयोजित होने वाले भंडारे की तैयारियों के बारे में जानकारी देते हुए डेरा सच्चा सौदा के प्रवक्ता डा. पवन इन्सां ने बताया कि तीन दिनों तक चलने वाले इस विशाल कार्यक्रम में देश-विदेश के विभिन्न राज्यों से आने वाली लाखों की साध संगत के ठहरने, खाने पीने, सोने, वाहनों की पार्किंग के लिए करीब एक लाख सेवादारों की डयूटियां लगाई गई है। ये सेवादार विभिन्न सेवा समितियों के अंतर्गत रहकर सेवा कार्य करेंगे। डा. इन्सां ने बताया कि लंगर सेवा, टै्रफिक सेवा, एंबुलैंस सेवा, पानी की सेवा,पंडाल समिति इत्यादि अलग अलग समितियां बनाई गई है। डा. इन्सां ने बताया कि साध संगत के ठहरने के लिए अलग अलग पंडाल बनाए गए है। महिलाओं व पुरूषों के लिए आने जाने के लिए अलग अलग मार्ग बनाए गए है, वाहनों की व्यवस्था की गई है। उन्होने बताया कि हजारों सेवादार सजावट कार्य में जुटे हुए है। डेरा सच्चा सौदा के शाह सतनाम जी धाम, शाह मस्ताना जी धाम, शाह सतनाम जी सुपर मार्किट, शाह सतनाम जी धाम से लेकर शाह सतनाम जी चौक तक भव्य सजावट की गई है। 'धन धन सतगुरू तेरा ही आसरा नारा लिखे बड़े बड़े स्वागती द्वारा आने वाली लाखों की साध संगत का स्वागत करते नजर आ रहे हैं।
डा. इन्सां ने बताया कि शाह सतनाम जी महाराज के पावन जन्मदिवस के उपलक्ष्य में 23 जनवरी को डेरा सच्चा सौदा में जन कल्याण परमार्थी शिविर का आयोजन किया जाएगा। जिसमें देश के प्रख्यात विशेषज्ञ चिकित्सक अपनी सेवाएं देंगे। उन्होने बताया कि परमार्थी शिविर में हृदय रोगियों, घुटनों के रोगों के साथ साथ अन्य रोगों की भी जांच की जाएगी। डा. इन्सां ने बताया कि पूज्य संत गुरमीत राम रहीम ङ्क्षसह जी इन्सां इस पावन अवसर पर 24 जनवरी को प्रात: मजलिस के उपरांत, 25 जनवरी को सुबह और शाम को भंडारे के उपरांत तथा 26 जनवरी को सुबह की रूहानी मजलिस के उपरांत लोगों को राम नाम, गुरूमंत्र की अनमोल दात प्रदान करके उन्हे नशा, मांसाहार जैसी बुराइयों से दूर रहने का संकल्प दिलवाएंगे। डा.इन्सां ने बताया कि 24 जनवरी को शाम को तथा 26 जनवरी की शाम को जाम ए इन्सां कार्यक्रम का भी आयोजन किया जाएगा।

परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज के पवित्र जन्मदिन का पावन भंडारा 25 जनवरी मंगलवार को

सिरसा।
          परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज के पवित्र जन्मदिन का पावन भंडारा 25 जनवरी मंगलवार को शाह सतनाम जी धाम में धूमधाम से मनाया जाएगा। यह जानकारी देते हुए डेरा सच्चा सौदा के प्रवक्ता डा. पवन इन्सां ने बताया कि पावन भंडारे के अवसर पर देश के विभिन्न राज्यों व विदेशों से लाखों की संख्या में श्रद्धालु डेरा सच्चा सौदा पहुंचेंगे। उन्होने बताया कि भंडारे की तैयारियां शुरू कर दी गई है। उन्होने बताया कि 24 जनवरी को सुबह की मजलिस के उपरांत पूज्य संत गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां गुरूमंत्र देंगे तथा शाम को रूहानी जाम पिलाया जाएगा। उन्होने बताया कि  25 जनवरी की सुबह रूहानी मजलिस के बाद तथा शाम को भंडारे के बाद भी गुरूमंत्र दिया जाएगा। डा. इन्सां ने बताया कि 26 जनवरी को सुबह की रूहानी मजलिस के बाद गुरूमंत्र दिया जाएगा तथा शाम को रूहानी जाम पिलाया जाएगा। उन्होने बताया कि इस कार्यक्रम को लेकर हजारों सेवादार भाइयों की डयूटियां लगाई गई है।

16 January 2011

ब्लाक स्तरीय नामचर्चा का आयोजन

सिरसा। निकटवर्ती गांव शाहपुर बेगू स्थित राजकीय उच्च विद्यालय में आज सिरसा ब्लाक की साध संगत द्वारा ब्लाक स्तरीय नामचर्चा का आयोजन किया गया। डेरा सच्चा सौदा की दूसरी पातशाही परमपिता शाह सतनाम ङ्क्षसह जी महाराज के पावन जन्ममाह को समर्पित नामचर्चा कार्यक्रम में सिरसा ब्लाक के विभिन्न गांवों से सैंकड़ों की संख्या में डेराप्रेमियों ने शिरकत की। नामचर्चा में डेराप्रेमी भजनों पर झूमझूम कर नाचे तथा जन्ममाह की खुशियां मनाई।
    शाहपुर बेगू स्थित राजकीय उच्च विद्यालय के प्रांगण में आयोजित नामचर्चा कार्यक्रम को लेकर भव्य सजावट की गई थी। मंच संचालन ब्लाक भंगीदास कस्तुर इन्सां ने किया। कविराज भाइयों ने मधुरवाणी में सतगुरूजी की महिमा का गुणगान किया। 'जनवरी महीना भागों वाला , 'जनवरी छाई बहार के इसमें आए सृजनहार, जन्मदिन आया है  , 'सतगुरू का जन्मदिन आ गया, सुन संगते , 'जलालआणे की धरती सजदा करो कबूल हमारा,'जलालआणं आए जलाल जीओ इत्यादि भजनों पर पंडाल में उपस्थित महिला व पुरूष श्रद्धालु मंत्रमुग्ध होकर झूमने लगे। इस अवसर पर पंद्रह मैम्बर मनोहर लाल इन्सां ने समस्त साध संगत को शाह सतनाम ङ्क्षसह जी महाराज के पावन जन्ममाह की शुभकामनाएं देते हुए आह्वान किया कि वे मानवता भलाई कार्यों में यूं ही अग्रणी बनी रहे। इस मौके पर सात मैम्बर जीत इन्सां , अमरजीत इन्सां , सतीश इन्सां , पंद्रह मैम्बर मीनू इन्सां, वीणा इन्सां, नीलम इन्सां, वीणा इन्सां, भंगीदास नटार जितेंद्र इन्सां, रमेश मोडिया, कमल सुखचैन, रमेश बेगू, नरेश डिंग, कपिल चत्तरगढ पट्टी, कश्मीर रंगडीखेड़ा, जोनी, विक्रमजीत, राजेंद्र, राजेश, गुलशन, सूरज, विक्की, सुशील, दवेंद्र, गुरदयाल, कृष्ण सहित अनेक  गणमान्य लोग उपस्थित थे।

11 January 2011

भजन संध्या आयोजित की गई

सिरसा, 10 जनवरी (): स्थानीय घंटाघर चौक स्थित श्री सिद्ध हनुमान मंदिर में दिवगंत साहित्यकार रमेश चंद्र शालिहास की दूसरी पुण्यतिथि के अवसर पर भजन संध्या आयोजित की गई। इस अवसर पर मारुति भजन मंडल की ओर से करीब आधी रात तक अनेक मधुर भजन प्रस्तुत किए गए। कार्यक्रम में उपस्थित श्री गोपाल शास्त्री व सुभाष शर्मा ने रमेश चंद्र शालिहास के साहित्य व उनके द्वारा स्थापित जीवन मूल्यों पर विस्तारपूर्वक चर्चा की गई। कार्यक्रम में महेश शर्मा, सुरेश शर्मा, बागेश शर्मा ने अतिथियों का स्वागत किया और आह्वान किया कि शास्त्री के बताए हुए मार्ग पर चलने का संकल्प लें। इस मौके पर महावीर मिश्र, पवन वशिष्ठ, जैन शर्मा व शालिहास के परिजन उपस्थित थे। कार्यक्रम का समापन प्रसाद वितरण से हुआ।